Akbar Masoom

Top 10 of Akbar Masoom

    पस-ए-फ़सील ज़मानों का इंतिज़ार न हो
    ये शहर और किसी शहर का ग़ुबार न हो

    ये ख़्वाब भी न किसी ख़्वाब का इशारा हो
    ये नींद और किसी नींद का ख़ुमार न हो

    ये दश्त और किसी दश्त का सराब सही
    ये बाग़ और किसी बाग़ की बहार न हो

    बहुत दिनों से यही सोच कर परेशाँ हूँ
    कि तू भी मेरे गुमाँ ही का ए'तिबार न हो

    कोई तो वस्ल की साअ'त हो जो ठहर जाए
    कोई तो साँस लूँ ऐसी कि जो शुमार न हो
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    Akbar Masoom
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    सुन! हिज्र और विसाल का जादू कहाँ गया
    मैं तो कहीं नहीं था मगर तू कहाँ गया

    जब ख़ेमा-ए-ख़याल में तस्वीर है वही
    वो दश्त-ए-ना-मुराद वो आहू कहाँ गया

    बिस्तर पे गिर रही है सियह आसमाँ से राख
    वो चाँदनी कहाँ है वो मह-रू कहाँ गया

    जिस के बग़ैर जी नहीं सकते थे जा चुका
    पर दिल से दर्द आँख से आँसू कहाँ गया

    फिर ख़ाक उड़ रही है मकान-ए-वजूद में
    जान-ए-बे-क़रार वो दिल-जू कहाँ गया
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    Akbar Masoom
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    ये गुल जिस ख़ाक से लाया गया है
    उसे अफ़्लाक से लाया गया है

    चमन पे रंग आता ही नहीं था
    तिरी पोशाक से लाया गया है

    ये दिल जिस से मैं शर्मिंदा बहुत हूँ
    उसी बेबाक से लाया गया है

    उजाला है जो ये कौन-ओ-मकाँ में
    हमारी ख़ाक से लाया गया है

    ये जो कुछ भी है आया है कहाँ से
    दिल-ए-सद-चाक से लाया गया है

    यहाँ कितनों ने देखा है जो तूफ़ाँ
    ख़स-ओ-ख़ाशाक से लाया गया है
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    Akbar Masoom
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    उस ख़ुश-अदा के आइना-ख़ाने में जाऊँगा
    फिर लौट कर मैं अपने ज़माने में जाऊँगा

    रह जाएगी ये सारी कहानी यहीं धरी
    इक रोज़ जब मैं अपने फ़साने में जाऊँगा

    ये सुब्ह ओ शाम यूँही रहेंगे मिरे चराग़
    बस मैं तुझे जलाने बुझाने में जाऊँगा

    ये खेल है तो ख़ूब मगर तेरे हाथ से
    इस टूटने बिगड़ने बनाने में जाऊँगा

    यूँही मैं ख़ुद को ख़्वाब दिखाने में आ गया
    यूँही मैं ख़ुद को ख़्वाब दिखाने में जाऊँगा
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    Akbar Masoom
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    ऐसा एक मक़ाम हो जिस में दिल जैसी वीरानी हो
    यादों जैसी तेज़ हवा हो दर्द से गहरा पानी हो

    एक सितारा रौशन हो जो कभी न बुझने वाला हो
    रस्ता जाना-पहचाना हो रात बहुत अन-जानी हो

    वो इक पल जो बीत गया उस में ही रहें तो अच्छा है
    क्या मालूम जो पल आए वो फ़ानी हो ला-फ़ानी हो

    मंज़र देखने वाला हो पर कोई न देखने वाला हो
    कोई न देखने वाला हो और दूर तलक हैरानी हो

    एक अजीब समाँ हो जैसे शे'र 'मुनीर'-नियाज़ी का
    एक तरफ़ आबादी हो और एक तरफ़ वीरानी हो
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    Akbar Masoom
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    नींद में गुनगुना रहा हूँ मैं
    ख़्वाब की धुन बना रहा हूँ मैं

    एक मुद्दत से बाग़ दुनिया का
    अपने दिल में लगा रहा हूँ मैं

    क्या बताऊँ तुम्हें वो शहर था क्या
    जिस की आब ओ हवा रहा हूँ मैं

    अब तुझे मेरा नाम याद नहीं
    जब कि तेरा पता रहा हूँ मैं

    आज कल तो किसी सदा की तरह
    अपने अंदर से आ रहा हूँ मैं

    ऐसा मुर्दा था मैं कि जीने के
    ख़ौफ़ में मुब्तला रहा हूँ मैं
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    Akbar Masoom
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    ये सारे फूल ये पत्थर उसी से मिलते हैं
    तो ऐ अज़ीज़ हम अक्सर उसी से मिलते हैं

    ख़ुदा गवाह कि उन में वही हलाकत है
    ये तेग़-ओ-तीर ये ख़ंजर उसी से मिलते हैं

    वो एक बार नहीं है हज़ार बार है वो
    सो हम उसी से बिछड़ कर उसी से मिलते हैं

    बिछा हुआ है वो गोया बिसात की सूरत
    ये सब सफ़ेद-ओ-सियह घर उसी से मिलते हैं

    ये धूप छाँव ये आब-ए-रवाँ ये अब्र ये फूल
    ये आसमाँ ये कबूतर उसी से मिलते हैं

    ये ख़ास साज़-ए-अज़ल से वो दाज्ला-ए-आहंग
    ये नील-ओ-ज़मज़म-ओ-कौसर उसी से मिलते हैं

    ये मोतिया ये चमेली ये मोगरा ये गुलाब
    ये सारे गहने ये ज़ेवर उसी से मिलते हैं

    अक़ीक़ गौहर-ओ-अल्मास नीलम-ओ-याक़ूत
    ये सब नगीने ये कंकर उसी से मिलते हैं
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    Akbar Masoom
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    अब भी अक्सर ध्यान तुम्हारा आता है
    देखो गुज़रा वक़्त दोबारा आता है

    आह नहीं आती है अब तो होंटों तक
    सीने से बस इक अँगारा आता है

    जाने किस दुनिया में सोती जागती हैं
    जिन आँखों से ख़्वाब हमारा आता है

    दिन भर जंगल की आवाज़ें आती हैं
    रात को घर में जंगल सारा आता है

    जिन रातों में चाँद हो या फिर चाँद न हो
    याद बहुत उस का रुख़्सारा आता है
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    Akbar Masoom
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    ये जो इक शाख़ है हरी थी अभी
    उस जगह पर कोई परी थी अभी

    सर-बसर रंग-ओ-नूर से लबरेज़
    इक सुराही यहाँ धरी थी अभी

    ख़ाक कैसी है मेरे पाँव तले
    सात रंगों की इक दरी थी अभी

    इस ख़राबे में कोई और भी है
    आह किस ने यहाँ भरी थी अभी

    सानेहा कोई याँ से गुज़रा है
    ये फ़ज़ा क्यूँ डरी डरी थी अभी

    मैं बसाता था उस के दिल में घर
    और क़िस्मत में बे-घरी थी अभी

    क्यूँ न करते हम उस की दिलदारी
    उस में कुछ ख़ू-ए-दिलबरी थी अभी
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    Akbar Masoom
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    न अपना नाम न चेहरा बदल के आया हूँ
    कि अब की बार मैं रस्ता बदल के आया हूँ

    वो और होंगे जो कार-ए-हवस पे ज़िंदा हैं
    मैं उस की धूप से साया बदल के आया हूँ

    ज़रा भी फ़र्क़ न पड़ता मकाँ बदलने से
    वो बाम-ओ-दर वो दरीचा बदल के आया हूँ

    मुझे ख़बर है कि दुनिया बदल नहीं सकती
    इसी लिए तो मैं चश्मा बदल के आया हूँ

    वही सुलूक वही भीक चाहता हूँ मैं
    वही फ़क़ीर हूँ कासा बदल के आया हूँ

    मुझे बताओ कोई काम फिर से करने का
    मैं अपना ख़ून पसीना बदल के आया हूँ

    मैं हो गया हूँ किसी नींद का शिराकत-दार
    मैं इक हसीन का तकिया बदल के आया हूँ

    सुनो कि जोंक लगाई है मैं ने पत्थर में
    मैं इक निगाह का शीशा बदल के आया हूँ

    मेरा तरीक़ा मेरा खेल ही निराला है
    न मैं ज़बान न लहजा बदल के आया हूँ

    वही असीर हूँ और है मेरी वही औक़ात
    मैं इस जहान में पिंजरा बदल के आया हूँ
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    Akbar Masoom
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