Mohsin Naqvi

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    "मुझे अब डर नहीं लगता"
    किसी के दूर जाने से
    तअ'ल्लुक़ टूट जाने से
    किसी के मान जाने से
    किसी के रूठ जाने से
    मुझे अब डर नहीं लगता
    किसी को आज़माने से
    किसी के आज़माने से
    किसी को याद रखने से
    किसी को भूल जाने से
    मुझे अब डर नहीं लगता
    किसी को छोड़ देने से
    किसी के छोड़ जाने से
    न शम्अ' को जलाने से
    न शम्अ' को बुझाने से
    मुझे अब डर नहीं लगता
    अकेले मुस्कुराने से
    कभी आँसू बहाने से
    न इस सारे ज़माने से
    हक़ीक़त से फ़साने से
    मुझे अब डर नहीं लगता
    किसी की ना-रसाई से
    किसी की पारसाई से
    किसी की बेवफ़ाई से
    किसी दुख इंतिहाई से
    मुझे अब डर नहीं लगता
    न तो इस पार रहने से
    न तो उस पार रहने से
    न अपनी ज़िंदगानी से
    न इक दिन मौत आने से
    मुझे अब डर नहीं लगता
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    ज़बाँ रखता हूँ लेकिन चुप खड़ा हूँ
    मैं आवाज़ों के बन में घिर गया हूँ

    मिरे घर का दरीचा पूछता है
    मैं सारा दिन कहाँ फिरता रहा हूँ

    मुझे मेरे सिवा सब लोग समझें
    मैं अपने आप से कम बोलता हूँ

    सितारों से हसद की इंतिहा है
    मैं क़ब्रों पर चराग़ाँ कर रहा हूँ

    सँभल कर अब हवाओं से उलझना
    मैं तुझ से पेश-तर बुझने लगा हूँ

    मिरी क़ुर्बत से क्यूँ ख़ाइफ़ है दुनिया
    समुंदर हूँ मैं ख़ुद में गूँजता हूँ

    मुझे कब तक समेटेगा वो 'मोहसिन'
    मैं अंदर से बहुत टूटा हुआ हूँ
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    उजड़े हुए लोगों से गुरेज़ाँ न हुआ कर
    हालात की क़ब्रों के ये कतबे भी पढ़ा कर

    क्या जानिए क्यूँ तेज़ हवा सोच में गुम है
    ख़्वाबीदा परिंदों को दरख़्तों से उड़ा कर

    उस शख़्स के तुम से भी मरासिम हैं तो होंगे
    वो झूट न बोलेगा मिरे सामने आ कर

    हर वक़्त का हँसना तुझे बर्बाद न कर दे
    तन्हाई के लम्हों में कभी रो भी लिया कर

    वो आज भी सदियों की मसाफ़त पे खड़ा है
    ढूँडा था जिसे वक़्त की दीवार गिरा कर

    ऐ दिल तुझे दुश्मन की भी पहचान कहाँ है
    तू हल्क़ा-ए-याराँ में भी मोहतात रहा कर

    इस शब के मुक़द्दर में सहर ही नहीं 'मोहसिन'
    देखा है कई बार चराग़ों को बुझा कर
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    मैं दिल पे जब्र करूँगा तुझे भुला दूँगा
    मरूँगा ख़ुद भी तुझे भी कड़ी सज़ा दूँगा

    ये तीरगी मिरे घर का ही क्यूँ मुक़द्दर हो
    मैं तेरे शहर के सारे दिए बुझा दूँगा

    हवा का हाथ बटाऊँगा हर तबाही में
    हरे शजर से परिंदे मैं ख़ुद उड़ा दूँगा

    वफ़ा करूँगा किसी सोगवार चेहरे से
    पुरानी क़ब्र पे कतबा नया सजा दूँगा

    इसी ख़याल में गुज़री है शाम-ए-दर्द अक्सर
    कि दर्द हद से बढ़ेगा तो मुस्कुरा दूँगा

    तू आसमान की सूरत है गर पड़ेगा कभी
    ज़मीं हूँ मैं भी मगर तुझ को आसरा दूँगा

    बढ़ा रही हैं मिरे दुख निशानियाँ तेरी
    मैं तेरे ख़त तिरी तस्वीर तक जला दूँगा

    बहुत दिनों से मिरा दिल उदास है 'मोहसिन'
    इस आइने को कोई अक्स अब नया दूँगा
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    ये दिल ये पागल दिल मिरा क्यूँ बुझ गया आवारगी
    इस दश्त में इक शहर था वो क्या हुआ आवारगी

    कल शब मुझे बे-शक्ल की आवाज़ ने चौंका दिया
    मैं ने कहा तू कौन है उस ने कहा आवारगी

    लोगो भला इस शहर में कैसे जिएँगे हम जहाँ
    हो जुर्म तन्हा सोचना लेकिन सज़ा आवारगी

    ये दर्द की तन्हाइयाँ ये दश्त का वीराँ सफ़र
    हम लोग तो उक्ता गए अपनी सुना आवारगी

    इक अजनबी झोंके ने जब पूछा मिरे ग़म का सबब
    सहरा की भीगी रेत पर मैं ने लिखा आवारगी

    उस सम्त वहशी ख़्वाहिशों की ज़द में पैमान-ए-वफ़ा
    उस सम्त लहरों की धमक कच्चा घड़ा आवारगी

    कल रात तन्हा चाँद को देखा था मैं ने ख़्वाब में
    'मोहसिन' मुझे रास आएगी शायद सदा आवारगी
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    यूँ देखते रहना उसे अच्छा नहीं 'मोहसिन'
    वो काँच का पैकर है तो पत्थर तिरी आँखें
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    इतनी मुद्दत बा'द मिले हो
    किन सोचों में गुम फिरते हो

    इतने ख़ाइफ़ क्यूँ रहते हो
    हर आहट से डर जाते हो

    तेज़ हवा ने मुझ से पूछा
    रेत पे क्या लिखते रहते हो

    काश कोई हम से भी पूछे
    रात गए तक क्यूँ जागे हो

    मैं दरिया से भी डरता हूँ
    तुम दरिया से भी गहरे हो

    कौन सी बात है तुम में ऐसी
    इतने अच्छे क्यूँ लगते हो

    पीछे मुड़ कर क्यूँ देखा था
    पत्थर बन कर क्या तकते हो

    जाओ जीत का जश्न मनाओ
    में झूटा हूँ तुम सच्चे हो

    अपने शहर के सब लोगों से
    मेरी ख़ातिर क्यूँ उलझे हो

    कहने को रहते हो दिल में
    फिर भी कितने दूर खड़े हो

    रात हमें कुछ याद नहीं था
    रात बहुत ही याद आए हो

    हम से न पूछो हिज्र के क़िस्से
    अपनी कहो अब तुम कैसे हो

    'मोहसिन' तुम बदनाम बहुत हो
    जैसे हो फिर भी अच्छे हो
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    उसे कहना बिछड़ने से मुहब्बत तो नहीं मरती
    बिछड़ जाना मुहब्बत की सदाकत की अलामत है

    मुहब्बत एक फितरत है, हां फ़ितरत कब बदलती है
    सो, जब हम दूर हो जाएं, नए रिश्तों में खो जाएं

    तो यह मत सोच लेना तुम, के मुहब्बत मर गई होगी
    नहीं ऐसे नहीं होगा

    मेरे बारे में गर तुम्हारी आंखें भर आयें
    छलक कर एक भी आंसू पलक पे जो उतर आये

    तो बस इतना समझ लेना,
    जो मेरे नाम से इतनी तेरे दिल को अक़ीदत है

    तेरे दिल में बिछड़ कर भी अभी मेरी मुहब्बत है
    मुहब्बत तो बिछड़ कर भी सदा आबाद रहती है

    मुहब्बत हो किसी से तो हमेशा याद रहती है
    मुहब्बत वक़्त के बे-रहम तूफ़ान से नहीं डरती
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    Mohsin Naqvi
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    एक चेहरा जो मेरे ख़्वाब सजा देता है
    मुझ को मेरे ही ख़्यालों में सदा देता है

    वो मेरा कौन है मालूम नहीं है लेकिन
    जब भी मिलता है तो पहलू में जगा देता है

    मैं जो अन्दर से कभी टूट के बिखरूं
    वो मुझ को थामने के लिए हाथ बढ़ा देता है

    मैं जो तनहा कभी चुपके से भी रोना चाहूँ
    तो दिल के दरवाज़े की ज़ंजीर हिला देता है

    उस की क़ुर्बत में है क्या बात न जाने “मोहसिन”
    एक लम्हे के लिए सदियों को भुला देता है
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    कौन सी बात है तुम में ऐसी
    इतने अच्छे क्यूँ लगते हो
    Mohsin Naqvi
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