Mohsin Naqvi

Mohsin Naqvi

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Mohsin Naqvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Mohsin Naqvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

सुना है शहर में ज़ख़्मी दिलों का मेला है चलेंगे हम भी मगर पैरहन रफ़ू कर के — Mohsin Naqvi
हर वक़्त का हँसना तुझे बर्बाद न कर दे तन्हाई के लम्हों में कभी रो भी लिया कर — Mohsin Naqvi
इक अजनबी झोंके ने जब पूछा मिरे ग़म का सबब सहरा की भीगी रेत पर मैं ने लिखा आवारगी — Mohsin Naqvi
यूँँ देखते रहना उसे अच्छा नहीं 'मोहसिन' वो काँच का पैकर है तो पत्थर तिरी आँखें — Mohsin Naqvi
अब एक पल का तग़ाफ़ुल भी सह नहीं सकते हम अहल-ए-दिल कभी आदी थे इंतिज़ार के भी — Mohsin Naqvi
खुली हैं आँखें मगर बदन है तमाम पत्थर कोई बताए मैं मर चुका हूँ कि जी रहा हूँ — Mohsin Naqvi
ज़बाँ रखता हूँ लेकिन चुप खड़ा हूँ मैं आवाज़ों के बन में घिर गया हूँ — Mohsin Naqvi
कौन सी बात है तुम में ऐसी इतने अच्छे क्यूँँ लगते हो — Mohsin Naqvi

Ghazal

भड़काएँ मेरी प्यास को अक्सर तेरी आँखें सहरा मेरा चेहरा है समुंदर तेरी आँखें फिर कौन भला दाद-ए-तबस्सुम उन्हें देगा रोएँगी बहुत मुझ से बिछड़ कर तेरी आँखें ख़ाली जो हुई शाम-ए-ग़रीबाँ की हथेली क्या क्या न लुटाती रहीं गौहर तेरी आँखें बोझल नज़र आती हैं ब-ज़ाहिर मुझे लेकिन खुलती हैं बहुत दिल में उतर कर तेरी आँखें अब तक मेरी यादों से मिटाए नहीं मिटता भीगी हुई इक शाम का मंज़र तेरी आँखें मुमकिन हो तो इक ताज़ा ग़ज़ल और भी कह लूँ फिर ओढ़ न लें ख़्वाब की चादर तेरी आँखें मैं संग-सिफ़त एक ही रस्ते में खड़ा हूँ शायद मुझे देखेंगी पलट कर तेरी आँखें यूँँ देखते रहना उसे अच्छा नहीं 'मोहसिन' वो काँच का पैकर है तो पत्थर तेरी आँखें — Mohsin Naqvi
फ़नकार है तो हाथ पे सूरज सजा के ला बुझता हुआ दिया न मुक़ाबिल हवा के ला दरिया का इंतिक़ाम डुबो दे न घर तिरा साहिल से रोज़ रोज़ न कंकर उठा के ला अब इख़्तिताम को है सख़ी हर्फ़-ए-इल्तिमास कुछ है तो अब वो सामने दस्त-ए-दुआ' के ला पैमाँ वफ़ा के बाँध मगर सोच सोच कर इस इब्तिदा में यूँँ न सुख़न इंतिहा के ला आराइश जराहत-ए-याराँ की बज़्म है जो ज़ख़्म दिल में हैं सभी तन पर सजा के ला थोड़ी सी और मौज में आ ऐ हवा-ए-गुल थोड़ी सी उस के जिस्म की ख़ुशबू चुरा के ला गर सोचना हैं अहल-ए-मशिय्यत के हौसले मैदाँ से घर में एक तू मय्यत उठा के ला 'मोहसिन' अब उस का नाम है सब की ज़बान पर किस ने कहा कि उस को ग़ज़ल में सजा के ला — Mohsin Naqvi
ग़ज़लों की धनक ओढ़ मिरे शो'ला-बदन तू है मेरा सुख़न तू मिरा मौज़ू-ए-सुख़न तू कलियों की तरह फूट सर-ए-शाख़-ए-तमन्ना ख़ुशबू की तरह फैल चमन-ता-ब-चमन तू नाज़िल हो कभी ज़ेहन पे आयात की सूरत आयात में ढल जा कभी जिबरील दहन तू अब क्यूँँ न सजाऊँ मैं तुझे दीदा ओ दिल में लगता है अँधेरे में सवेरे की किरन तू पहले न कोई रम्ज़-ए-सुख़न थी न किनाया अब नुक़्ता-ए-तकमील-ए-हुनर मेहवर-ए-फ़न तू ये कम तो नहीं तू मिरा मेयार-ए-नज़र है ऐ दोस्त मिरे वास्ते कुछ और न बन तू मुमकिन हो तो रहने दे मुझे ज़ुल्मत-ए-जाँ में ढूँडेगा कहाँ चाँदनी रातों का कफ़न तू — Mohsin Naqvi
फिर वही मैं हूँ वही शहर-बदर सन्नाटा मुझ को डस ले न कहीं ख़ाक-बसर सन्नाटा दश्त-ए-हस्ती में शब-ए-ग़म की सहर करने को हिज्र वालों ने लिया रख़्त-ए-सफ़र सन्नाटा किस से पूछूँ कि कहाँ है मिरा रोने वाला इस तरफ़ मैं हूँ मिरे घर से उधर सन्नाटा तू सदाओं के भँवर में मुझे आवाज़ तो दे तुझ को देगा मिरे होने की ख़बर सन्नाटा उस को हंगामा-ए-मंज़िल की ख़बर क्या दोगे जिस ने पाया हो सर-ए-राहगुज़र सन्नाटा हासिल-ए-कुंज-ए-क़फ़स वहम-ब-कफ़ तन्हाई रौनक़-ए-शाम-ए-सफ़र ता-ब-सहर सन्नाटा क़िस्मत-ए-शाइर-ए-सीमाब-सिफ़त दश्त की मौत क़ीमत-ए-रेज़ा-ए-अल्मास-ए-हुनर सन्नाटा जान-ए-'मोहसिन' मिरी तक़दीर में कब लिक्खा है डूबता चाँद तिरा क़ुर्ब-ए-गज़र सन्नाटा — Mohsin Naqvi
सारे लहजे तिरे बे-ज़माँ एक मैं इस भरे शहर में राएगाँ एक मैं वस्ल के शहर की रौशनी एक तू हिज्र के दश्त में कारवाँ एक मैं बिजलियों से भरी बारिशें ज़ोर पर अपनी बस्ती में कच्चा मकाँ एक मैं हसरतों से अटे आसमाँ के तले जलती-बुझती हुई कहकशाँ एक मैं मुझ को फ़ारिग़ दिनों की अमानत समझ भूली-बिसरी हुई दास्ताँ एक मैं रौनक़ें शोर मेले झमेले तिरे अपनी तन्हाई का राज़-दाँ एक मैं एक मैं अपनी ही ज़िंदगी का भरम अपनी ही मौत पर नौहा-ख़्वाँ एक मैं उस तरफ़ संग-बारी हर इक बाम से इस तरफ़ आइनों की दुकाँ एक मैं वो नहीं है तो 'मोहसिन' ये मत सोचना अब भटकता फिरूंगा कहाँ एक मैं — Mohsin Naqvi
क़त्ल छुपते थे कभी संग की दीवार के बीच अब तो खुलने लगे मक़्तल भरे बाज़ार के बीच अपनी पोशाक के छिन जाने पे अफ़सोस न कर सर सलामत नहीं रहते यहाँ दस्तार के बीच सुर्ख़ियाँ अम्न की तल्क़ीन में मसरूफ़ रहीं हर्फ़ बारूद उगलते रहे अख़बार के बीच काश इस ख़्वाब की ता'बीर की मोहलत न मिले शो'ले उगते नज़र आए मुझे गुलज़ार के बीच ढलते सूरज की तमाज़त ने बिखर कर देखा सर-कशीदा मिरा साया सफ़-ए-अशजार के बीच रिज़्क़ मल्बूस मकाँ साँस मरज़ क़र्ज़ दवा मुनक़सिम हो गया इंसाँ इन्ही अफ़्कार के बीच देखे जाते न थे आँसू मिरे जिस से 'मोहसिन' आज हँसते हुए देखा उसे अग़्यार के बीच — Mohsin Naqvi
ये कह गए हैं मुसाफ़िर लुटे घरों वाले डरें हवा से परिंदे खुले परों वाले ये मेरे दिल की हवस दश्त-ए-बे-कराँ जैसी वो तेरी आँख के तेवर समुंदरों वाले हवा के हाथ में कासे हैं ज़र्द पत्तों के कहाँ गए वो सख़ी सब्ज़ चादरों वाले कहाँ मिलेंगे वो अगले दिनों के शहज़ादे पहन के तन पे लिबादे गदागरों वाले पहाड़ियों में घिरे ये बुझे बुझे रस्ते कभी इधर से गुज़रते थे लश्करों वाले उन्हीं पे हो कभी नाज़िल अज़ाब आग अजल वही नगर कभी ठहरें पयम्बरों वाले तिरे सुपुर्द करूँँ आईने मुक़द्दर के इधर तो आ मिरे ख़ुश-रंग पत्थरों वाले किसी को देख के चुप चुप से क्यूँँ हुए 'मोहसिन' कहाँ गए वो इरादे सुख़न-वरों वाले — Mohsin Naqvi
बिछड़ के मुझ से कभी तू ने ये भी सोचा है अधूरा चाँद भी कितना उदास लगता है ये ख़त्म-ए-वस्ल का लम्हा है राएगाँ न समझ कि इस के बा'द वही दूरियों का सहरा है कुछ और देर न झड़ना उदासियों के शजर किसे ख़बर तेरे साए में कौन बैठा है ये रख-रखाव मुहब्बत सिखा गए उस को वो रूठ कर भी मुझे मुस्कुरा के मिलता है मैं किस तरह तुझे देखूँ नज़र झिझकती है तेरा बदन है कि ये आइनों का दरिया है कुछ इस क़दर भी तो आसाँ नहीं है इश्क़ तेरा ये ज़हर दिल में उतर कर ही रास आता है मैं तुझ को पा के भी खोया हुआ सा रहता हूँ कभी कभी तो मुझे तू ने ठीक समझा है मुझे ख़बर है कि क्या है जुदाइयों का अज़ाब कि मैं ने शाख़ से गुल को बिछड़ते देखा है मैं मुस्कुरा भी पड़ा हूँ तो क्यूँँ ख़फ़ा हैं ये लोग कि फूल टूटी हुई क़ब्र पर भी खिलता है उसे गँवा के मैं ज़िंदा हूँ इस तरह 'मोहसिन' कि जैसे तेज़ हवा में चराग़ जलता है — Mohsin Naqvi
ख़ुमार-ए-मौसम-ए-ख़ुश्बू हद-ए-चमन में खुला मिरी ग़ज़ल का ख़ज़ाना तिरे बदन में खुला तुम उस का हुस्न कभी उस की बज़्म में देखो कि माहताब सदा शब के पैरहन में खुला अजब नशा था मगर उस की बख़्शिश-ए-लब में कि यूँँ तो हम से भी क्या क्या न वो सुख़न में खुला न पूछ पहली मुलाक़ात में मिज़ाज उस का वो रंग रंग में सिमटा किरन किरन में खुला बदन की चाप निगह की ज़बाँ भी होती है ये भेद हम पे मगर उस की अंजुमन में खुला कि जैसे अब्र हवा की गिरह से खुल जाए सफ़र की शाम मिरा मेहरबाँ थकन में खुला कहूँ मैं किस से निशानी थी किस मसीहा की वो एक ज़ख़्म कि 'मोहसिन' मिरे कफ़न में खुला — Mohsin Naqvi
लबों पे हर्फ़-ए-रजज़ है ज़िरह उतार के भी मैं जश्न-ए-फ़तह मनाता हूँ जंग हार के भी उसे लुभा न सका मेरे बा'द का मौसम बहुत उदास लगा ख़ाल-ओ-ख़द सँवार के भी अब एक पल का तग़ाफ़ुल भी सह नहीं सकते हम अहल-ए-दिल कभी आदी थे इंतिज़ार के भी वो लम्हा भर की कहानी कि उम्र भर में कही अभी तो ख़ुद से तक़ाज़े थे इख़्तिसार के भी ज़मीन ओढ़ ली हम ने पहुँच के मंज़िल पर कि हम पे क़र्ज़ थे कुछ गर्द-ए-रहगुज़ार के भी मुझे न सुन मिरे बे-शक्ल अब दिखाई तो दे मैं थक गया हूँ फ़ज़ा में तुझे पुकार के भी मिरी दुआ को पलटना था फिर उधर 'मोहसिन' बहुत उजाड़ थे मंज़र उफ़ुक़ से पार के भी — Mohsin Naqvi
फ़ज़ा का हब्स शगूफ़ों को बास क्या देगा बदन-दरीदा किसी को लिबास क्या देगा ये दिल कि क़हत-ए-अना से ग़रीब ठहरा है मिरी ज़बाँ को ज़र-ए-इल्तिमास क्या देगा जो दे सका न पहाड़ों को बर्फ़ की चादर वो मेरी बाँझ ज़मीं को कपास क्या देगा ये शहर यूँँ भी तो दहशत भरा नगर है यहाँ दिलों का शोर हवा को हिरास क्या देगा वो ज़ख़्म दे के मुझे हौसला भी देता है अब इस से बढ़ के तबीअत-शनास क्या देगा जो अपनी ज़ात से बाहर न आ सका अब तक वो पत्थरों को मता-ए-हवा से क्या देगा वो मेरे अश्क बुझाएगा किस तरह 'मोहसिन' समुंदरों को वो सहरा की प्यास क्या देगा — Mohsin Naqvi
साँसों के इस हुनर को न आसाँ ख़याल कर ज़िंदा हूँ साअ'तों को मैं सदियों में ढाल कर माली ने आज कितनी दुआएँ वसूल कीं कुछ फूल इक फ़क़ीर की झोली में डाल कर कुल यौम-ए-हिज्र ज़र्द ज़मानों का यौम है शब भर न जाग मुफ़्त में आँखें न लाल कर ऐ गर्द-बाद लौट के आना है फिर मुझे रखना मिरे सफ़र की अज़िय्यत सँभाल कर मेहराब में दिए की तरह ज़िंदगी गुज़ार मुँह-ज़ोर आँधियों में न ख़ुद को निढाल कर शायद किसी ने बुख़्ल-ए-ज़मीं पर किया है तंज़ गहरे समुंदरों से जज़ीरे निकाल कर ये नक़्द-ए-जाँ कि इस का लुटाना तो सहल है गर बन पड़े तो इस से भी मुश्किल सवाल कर 'मोहसिन' बरहना-सर चली आई है शाम-ए-ग़म ग़ुर्बत न देख इस पे सितारों की शाल कर — Mohsin Naqvi

Nazm

"मुझे अब डर नहीं लगता" किसी के दूर जाने से तअ'ल्लुक़ टूट जाने से किसी के मान जाने से किसी के रूठ जाने से मुझे अब डर नहीं लगता किसी को आज़माने से किसी के आज़माने से किसी को याद रखने से किसी को भूल जाने से मुझे अब डर नहीं लगता किसी को छोड़ देने से किसी के छोड़ जाने से न शम्अ' को जलाने से न शम्अ' को बुझाने से मुझे अब डर नहीं लगता अकेले मुस्कुराने से कभी आँसू बहाने से न इस सारे ज़माने से हक़ीक़त से फ़साने से मुझे अब डर नहीं लगता किसी की ना-रसाई से किसी की पारसाई से किसी की बे-वफ़ाई से किसी दुख इंतिहाई से मुझे अब डर नहीं लगता न तो इस पार रहने से न तो उस पार रहने से न अपनी ज़िंदगानी से न इक दिन मौत आने से मुझे अब डर नहीं लगता — Mohsin Naqvi
उसे कहना बिछड़ने से मुहब्बत तो नहीं मरती बिछड़ जाना मुहब्बत की सदाकत की अलामत है मुहब्बत एक फितरत है, हाँ फ़ितरत कब बदलती है सो, जब हम दूर हो जाएँ, नए रिश्तों में खो जाएँ तो ये मत सोच लेना तुम, के मुहब्बत मर गई होगी नहीं ऐसे नहीं होगा मेरे बारे में गर तुम्हारी आँखें भर आएँ छलक कर एक भी आँसू पलक पे जो उतर आए तो बस इतना समझ लेना, जो मेरे नाम से इतनी तेरे दिल को अक़ीदत है तेरे दिल में बिछड़ कर भी अभी मेरी मुहब्बत है मुहब्बत तो बिछड़ कर भी सदा आबाद रहती है मुहब्बत हो किसी से तो हमेशा याद रहती है मुहब्बत वक़्त के बे-रहम तूफ़ान से नहीं डरती — Mohsin Naqvi
"दिसम्बर मुझे रास आता नहीं" कई साल गुज़रे कई साल बीते शब-ओ-रोज़ की गर्दिशों का तसलसुल दिल-ओ-जान में साँसों की परतें उल्टे हुए ज़लज़लों की तरह हांफ़ता है चटख़्ते हुए ख़्वाब आँखों की नाज़ुक रगें छीलते हैं मगर मैं इक साल की गोद में जागती सुब्ह को बे-करांचाहतों से अटी ज़िंदगी की दुआ दे कर अब तक वही जुस्तुजू का सफ़र कर रहा हूँ गुज़रता हुआ साल जैसा भी गुज़रा मगर साल के आख़िरी दिन निहायत कठिन हैं मिरे मिलने वालो नए साल की मुस्कुराती हुई सुब्ह गर हाथ आए तो मिलना कि जाते हुए साल की साअ'तों में ये बुझता हुआ दिल धड़कता तो है मुस्कुराता नहीं दिसम्बर मुझे रास आता नहीं — Mohsin Naqvi