use kehna bichhadne se muhabbat to nahin marti | उसे कहना बिछड़ने से मुहब्बत तो नहीं मरती

  - Mohsin Naqvi

उसे कहना बिछड़ने से मुहब्बत तो नहीं मरती
बिछड़ जाना मुहब्बत की सदाकत की अलामत है

मुहब्बत एक फितरत है, हां फ़ितरत कब बदलती है
सो, जब हम दूर हो जाएं, नए रिश्तों में खो जाएं

तो यह मत सोच लेना तुम, के मुहब्बत मर गई होगी
नहीं ऐसे नहीं होगा

मेरे बारे में गर तुम्हारी आंखें भर आयें
छलक कर एक भी आंसू पलक पे जो उतर आये

तो बस इतना समझ लेना,
जो मेरे नाम से इतनी तेरे दिल को अक़ीदत है

तेरे दिल में बिछड़ कर भी अभी मेरी मुहब्बत है
मुहब्बत तो बिछड़ कर भी सदा आबाद रहती है

मुहब्बत हो किसी से तो हमेशा याद रहती है
मुहब्बत वक़्त के बे-रहम तूफ़ान से नहीं डरती

  - Mohsin Naqvi

Chehra Shayari

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    बिछड़ के मुझ से कभी तूने ये भी सोचा है
    अधूरा चाँद भी कितना उदास लगता है

    ये ख़त्म-ए-वस्ल का लम्हा है राएगाँ न समझ
    कि इस के बाद वही दूरियों का सहरा है

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    किसे ख़बर तेरे साए में कौन बैठा है

    ये रख-रखाव मुहब्बत सिखा गए उस को
    वो रूठ कर भी मुझे मुस्कुरा के मिलता है

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    कुछ इस क़दर भी तो आसाँ नहीं है इश्क़ तेरा
    ये ज़हर दिल में उतर कर ही रास आता है

    मैं तुझ को पा के भी खोया हुआ सा रहता हूँ
    कभी कभी तो मुझे तूने ठीक समझा है

    मुझे ख़बर है कि क्या है जुदाइयों का अज़ाब
    कि मैंने शाख़ से गुल को बिछड़ते देखा है

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    उसे गँवा के मैं जिंदा हूँ इस तरह 'मोहसिन'
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    Mohsin Naqvi
    ज़िक्र-ए-शब-ए-फ़िराक़ से वहशत उसे भी थी
    मेरी तरह किसी से मोहब्बत उसे भी थी

    मुझ को भी शौक़ था नए चेहरों की दीद का
    रस्ता बदल के चलने की आदत उसे भी थी

    इस रात देर तक वो रहा महव-ए-गुफ़्तुगू
    मसरूफ़ मैं भी कम था फ़राग़त उसे भी थी

    मुझ से बिछड़ के शहर में घुल-मिल गया वो शख़्स
    हालाँकि शहर-भर से अदावत उसे भी थी

    वो मुझ से बढ़ के ज़ब्त का आदी था जी गया
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    सुनता था वो भी सब से पुरानी कहानियाँ
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    साए से प्यार धूप से नफ़रत उसे भी थी

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    दरपेश एक ताज़ा मुसीबत उसे भी थी
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    Mohsin Naqvi
    अब के बारिश में तो ये कार-ए-ज़ियाँ होना ही था
    अपनी कच्ची बस्तियों को बे-निशाँ होना ही था

    किस के बस में था हवा की वहशतों को रोकना
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    जब कोई सम्त-ए-सफ़र तय थी न हद्द-ए-रहगुज़र
    ऐ मिरे रह-रौ सफ़र तो राएगाँ होना ही था

    मुझ को रुकना था उसे जाना था अगले मोड़ तक
    फ़ैसला ये उस के मेरे दरमियाँ होना ही था

    चाँद को चलना था बहती सीपियों के साथ साथ
    मो'जिज़ा ये भी तह-ए-आब-ए-रवाँ होना ही था

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    मेरी इस आदत से उस को बद-गुमाँ होना ही था

    शहर से बाहर की वीरानी बसाना थी मुझे
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    Mohsin Naqvi
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    सिरहाने मौत बैठी रो रही थी

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    मिरा क़ातिल मिरे अंदर छुपा था
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    Mohsin Naqvi
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    हिज्र के दश्त में कारवाँ एक मैं

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    जलती-बुझती हुई कहकशाँ एक मैं

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    Mohsin Naqvi

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