दिल को दर्द-आश्ना किया तू ने
    दर्द-ए-दिल को दवा किया तू ने

    तब-ए-इंसाँ को दी सिरिश्त-ए-वफ़ा
    ख़ाक को कीमिया किया तू ने

    वस्ल-ए-जानाँ मुहाल ठहराया
    क़त्ल-ए-आशिक़ रवा किया तू ने

    था न जुज़ ग़म बिसात-ए-आशिक़ में
    ग़म को राहत-फ़ज़ा किया तू ने

    जान थी इक वबाल फ़ुर्क़त में
    शौक़ को जाँ-गुज़ा किया तू ने

    थी मोहब्बत में नंग मिन्नत-ए-ग़ैर
    जज़्ब-ए-दिल को रसा किया तू ने

    राह ज़ाहिद को जब कहीं न मिली
    दर-ए-मय-ख़ाना वा किया तू ने

    क़त्अ होने ही जब लगा पैवंद
    ग़ैर को आश्ना किया तू ने

    थी जहाँ कारवाँ को देनी राह
    इश्क़ को रहनुमा किया तू ने

    नाव भर कर जहाँ डुबोनी थी
    अक़्ल को नाख़ुदा किया तू ने

    बढ़ गई जब पिदर को मेहर-ए-पिसर
    उस को उस से जुदा किया तू ने

    जब हुआ मुल्क ओ माल रहज़न-ए-होश
    बादशह को गदा किया तू ने

    जब मिली काम-ए-जाँ को लज़्ज़त-ए-दर्द
    दर्द को बे-दवा किया तू ने

    जब दिया राह-रौ को ज़ौक़-ए-तलब
    सई को ना-रसा किया तू ने

    पर्दा-ए-चश्म थे हिजाब बहुत
    हुस्न को ख़ुद-नुमा किया तू ने

    इश्क़ को ताब-ए-इंतिज़ार न थी
    ग़ुर्फ़ा इक दिल में वा किया तू ने

    हरम आबाद और दैर ख़राब
    जो किया सब बजा किया तू ने

    सख़्त अफ़्सुर्दा तब्अ' थी अहबाब
    हम को जादू नवा किया तू ने

    फिर जो देखा तो कुछ न था या रब
    कौन पूछे कि क्या किया तू ने

    'हाली' उट्ठा हिला के महफ़िल को
    आख़िर अपना कहा किया तू ने
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    Altaf Hussain Hali
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    उस के जाते ही ये क्या हो गई घर की सूरत
    न वो दीवार की सूरत है न दर की सूरत

    किस से पैमान-ए-वफ़ा बाँध रही है बुलबुल
    कल न पहचान सकेगी गुल-ए-तर की सूरत

    है ग़म-ए-रोज़-ए-जुदाई न नशात-ए-शब-ए-वस्ल
    हो गई और ही कुछ शाम-ओ-सहर की सूरत

    अपनी जेबों से रहें सारे नमाज़ी हुश्यार
    इक बुज़ुर्ग आते हैं मस्जिद में ख़िज़र की सूरत

    देखिए शैख़ मुसव्विर से खिचे या न खिचे
    सूरत और आप से बे-ऐब बशर की सूरत

    वाइ'ज़ो आतिश-ए-दोज़ख़ से जहाँ को तुम ने
    ये डराया है कि ख़ुद बन गए डर की सूरत

    क्या ख़बर ज़ाहिद-ए-क़ाने को कि क्या चीज़ है हिर्स
    उस ने देखी ही नहीं कीसा-ए-ज़र की सूरत

    मैं बचा तीर-ए-हवादिस से निशाना बन कर
    आड़े आई मिरी तस्लीम-ए-सिपर की सूरत

    शौक़ में उस के मज़ा दर्द में उस के लज़्ज़त
    नासेहो उस से नहीं कोई मफ़र की सूरत

    हमला अपने पे भी इक बाद-ए-हज़ीमत है ज़रूर
    रह गई है यही इक फ़त्ह ओ ज़फ़र की सूरत

    रहनुमाओं के हुए जाते हैं औसान ख़ता
    राह में कुछ नज़र आती है ख़तर की सूरत

    यूँ तो आया है तबाही में ये बेड़ा सौ बार
    पर डराती है बहुत आज भँवर की सूरत

    उन को 'हाली' भी बुलाते हैं घर अपने मेहमाँ
    देखना आप की और आप के घर की सूरत
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    Altaf Hussain Hali
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    आगे बढ़े न क़िस्सा-ए-इश्क़-ए-बुताँ से हम
    सब कुछ कहा मगर न खुले राज़दाँ से हम

    अब भागते हैं साया-ए-इश्क़-ए-बुताँ से हम
    कुछ दिल से हैं डरे हुए कुछ आसमाँ से हम

    हँसते हैं उस के गिर्या-ए-बे-इख़्तियार पर
    भूले हैं बात कह के कोई राज़दाँ से हम

    अब शौक़ से बिगड़ के ही बातें किया करो
    कुछ पा गए हैं आप के तर्ज़-ए-बयाँ से हम

    जन्नत में तो नहीं अगर ये ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-इश्क़
    बदलेंगे तुझ को ज़िंदगी-ए-जावेदाँ से हम
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    Altaf Hussain Hali
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    बुरी और भली सब गुज़र जाएगी
    ये कश्ती यूँही पार उतर जाएगी

    मिलेगा न गुलचीं को गुल का पता
    हर इक पंखुड़ी यूँ बिखर जाएगी

    रहेंगे न मल्लाह ये दिन सदा
    कोई दिन में गंगा उतर जाएगी

    इधर एक हम और ज़माना उधर
    ये बाज़ी तो सो बिसवे हर जाएगी

    बनावट की शेख़ी नहीं रहती शैख़
    ये इज़्ज़त तो जाएगी पर जाएगी

    न पूरी हुई हैं उमीदें न हों
    यूँही उम्र सारी गुज़र जाएगी

    सुनेंगे न 'हाली' की कब तक सदा
    यही एक दिन काम कर जाएगी
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    Altaf Hussain Hali
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    बात कुछ हम से बन न आई आज
    बोल कर हम ने मुँह की खाई आज

    चुप पर अपनी भरम थे क्या क्या कुछ
    बात बिगड़ी बनी बनाई आज

    शिकवा करने की ख़ू न थी अपनी
    पर तबीअत ही कुछ भर आई आज

    बज़्म साक़ी ने दी उलट सारी
    ख़ूब भर भर के ख़ुम लुंढाई आज

    मासियत पर है देर से या रब
    नफ़्स और शरा में लड़ाई आज

    ग़ालिब आता है नफ़्स-ए-दूँ या शरअ'
    देखनी है तिरी ख़ुदाई आज

    चोर है दिल में कुछ न कुछ यारो
    नींद फिर रात भर न आई आज

    ज़द से उल्फ़त की बच के चलना था
    मुफ़्त 'हाली' ने चोट खाई आज
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    Altaf Hussain Hali
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    जीते जी मौत के तुम मुँह में न जाना हरगिज़
    दोस्तो दिल न लगाना न लगाना हरगिज़

    इश्क़ भी ताक में बैठा है नज़र-बाज़ों की
    देखना शेर से आँखें न लड़ाना हरगिज़

    हाथ मलने न हों पीरी में अगर हसरत से
    तो जवानी में न ये रोग बसाना हरगिज़

    जितने रस्ते थे तिरे हो गए वीराँ ऐ इश्क़
    आ के वीरानों में अब घर न बसाना हरगिज़

    कूच सब कर गए दिल्ली से तिरे क़द्र-शनास
    क़द्र याँ रह के अब अपनी न गँवाना हरगिज़

    तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़
    न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़

    ढूँडता है दिल-ए-शोरीदा बहाने मुतरिब
    दर्द-अंगेज़ ग़ज़ल कोई न गाना हरगिज़

    सोहबतें अगली मुसव्विर हमें याद आएँगी
    कोई दिलचस्प मुरक़्क़ा न दिखाना हरगिज़

    ले के दाग़ आएगा सीने पे बहुत ऐ सय्याह
    देख इस शहर के खंडरों में न जाना हरगिज़

    चप्पे चप्पे पे हैं याँ गौहर-ए-यकता तह-ए-ख़ाक
    दफ़्न होगा कहीं इतना न ख़ज़ाना हरगिज़

    मिट गए तेरे मिटाने के निशाँ भी अब तो
    ऐ फ़लक इस से ज़ियादा न मिटाना हरगिज़

    वो तो भूले थे हमें हम भी उन्हें भूल गए
    ऐसा बदला है न बदलेगा ज़माना हरगिज़

    हम को गर तू ने रुलाया तो रुलाया ऐ चर्ख़
    हम पे ग़ैरों को तो ज़ालिम न हँसाना हरगिज़

    आख़िरी दौर में भी तुझ को क़सम है साक़ी
    भर के इक जाम न प्यासों को पिलाना हरगिज़

    बख़्त सोए हैं बहुत जाग के ऐ दौर-ए-ज़माँ
    न अभी नींद के मातों को जगाना हरगिज़

    कभी ऐ इल्म ओ हुनर घर था तुम्हारा दिल्ली
    हम को भूले हो तो घर भूल न जाना हरगिज़

    शाइरी मर चुकी अब ज़िंदा न होगी यारो
    याद कर कर के उसे जी न कुढ़ाना हरगिज़

    'ग़ालिब' ओ 'शेफ़्ता' ओ 'नय्यर' ओ 'आज़ुर्दा' ओ 'ज़ौक़'
    अब दिखाएगा ये शक्लें न ज़माना हरगिज़

    'मोमिन' ओ 'अल्वी' ओ 'सहबाई' ओ 'ममनूँ' के बाद
    शेर का नाम न लेगा कोई दाना हरगिज़

    कर दिया मर के यगानों ने यगाना हम को
    वर्ना याँ कोई न था हम में यगाना हरगिज़

    'दाग़' ओ 'मजरूह' को सुन लो कि फिर इस गुलशन में
    न सुनेगा कोई बुलबुल का तराना हरगिज़

    रात आख़िर हुई और बज़्म हुई ज़ेर-ओ-ज़बर
    अब न देखोगे कभी लुत्फ़-ए-शबाना हरगिज़

    बज़्म-ए-मातम तो नहीं बज़्म-ए-सुख़न है 'हाली'
    याँ मुनासिब नहीं रो रो के रुलाना हरगिज़
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    Altaf Hussain Hali
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    कोई महरम नहीं मिलता जहाँ में
    मुझे कहना है कुछ अपनी ज़बाँ में

    क़फ़स में जी नहीं लगता किसी तरह
    लगा दो आग कोई आशियाँ में

    कोई दिन बुल-हवस भी शाद हो लें
    धरा क्या है इशारात-ए-निहाँ में

    कहीं अंजाम आ पहुँचा वफ़ा का
    घुला जाता हूँ अब के इम्तिहाँ में

    नया है लीजिए जब नाम उस का
    बहुत वुसअ'त है मेरी दास्ताँ में

    दिल-ए-पुर-दर्द से कुछ काम लूँगा
    अगर फ़ुर्सत मिली मुझ को जहाँ में

    बहुत जी ख़ुश हुआ 'हाली' से मिल कर
    अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जहाँ में
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    Altaf Hussain Hali
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    है जुस्तुजू कि ख़ूब से है ख़ूब-तर कहाँ
    अब ठहरती है देखिए जा कर नज़र कहाँ

    हैं दौर-ए-जाम-ए-अव्वल-ए-शब में ख़ुदी से दूर
    होती है आज देखिए हम को सहर कहाँ

    या रब इस इख़्तिलात का अंजाम हो ब-ख़ैर
    था उस को हम से रब्त मगर इस क़दर कहाँ

    इक उम्र चाहिए कि गवारा हो नीश-ए-इश्क़
    रक्खी है आज लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर कहाँ

    बस हो चुका बयाँ कसल-ओ-रंज-ए-राह का
    ख़त का मिरे जवाब है ऐ नामा-बर कहाँ

    कौन ओ मकाँ से है दिल-ए-वहशी कनारा-गीर
    इस ख़ानुमाँ-ख़राब ने ढूँडा है घर कहाँ

    हम जिस पे मर रहे हैं वो है बात ही कुछ और
    आलम में तुझ से लाख सही तू मगर कहाँ

    होती नहीं क़ुबूल दुआ तर्क-ए-इश्क़ की
    दिल चाहता न हो तो ज़बाँ में असर कहाँ

    'हाली' नशात-ए-नग़्मा-ओ-मय ढूँढते हो अब
    आए हो वक़्त-ए-सुब्ह रहे रात भर कहाँ
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    Altaf Hussain Hali
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    माँ बाप और उस्ताद सब हैं ख़ुदा की रहमत
    है रोक-टोक उन की हक़ में तुम्हारे नेमत
    Altaf Hussain Hali
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    फ़रिश्ते से बढ़ कर है इंसान बनना
    मगर इस में लगती है मेहनत ज़ियादा
    Altaf Hussain Hali
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