Altaf Hussain Hali

Altaf Hussain Hali

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Altaf Hussain Hali shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Altaf Hussain Hali's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हम जिस पे मर रहे हैं वो है बात ही कुछ और आलम में तुझ से लाख सही तू मगर कहाँ — Altaf Hussain Hali
राज़ी हैं हम कि दोस्त से हो दुश्मनी मगर दुश्मन को हम से दोस्त बनाया न जाएगा — Altaf Hussain Hali
वो उम्मीद क्या जिस की हो इंतिहा वो वा'दा नहीं जो वफ़ा हो गया — Altaf Hussain Hali
है जुस्तुजू कि ख़ूब से है ख़ूब-तर कहाँ अब ठहरती है देखिए जा कर नज़र कहाँ — Altaf Hussain Hali
यही है इबादत यही दीन-ओ-ईमाँ कि काम आए दुनिया में इंसाँ के इंसाँ — Altaf Hussain Hali
उम्र शायद न करे आज वफ़ा काटना है शब-ए-तन्हाई का — Altaf Hussain Hali
फ़रिश्ते से बढ़ कर है इंसान बनना मगर इस में लगती है मेहनत ज़ियादा — Altaf Hussain Hali
हम ने हर अदना को आ'ला कर दिया ख़ाकसारी अपनी काम आई बहुत — Altaf Hussain Hali
हम ने अव्वल से पढ़ी है ये किताब आख़िर तक हम से पूछे कोई होती है मोहब्बत कैसी — Altaf Hussain Hali
फ़राग़त से दुनिया में हर दम न बैठो अगर चाहते हो फ़राग़त ज़ियादा — Altaf Hussain Hali
होती नहीं क़ुबूल दुआ तर्क-ए-इश्क़ की दिल चाहता न हो तो ज़बाँ में असर कहाँ — Altaf Hussain Hali
उस ने अच्छा ही किया हाल न पूछा दिल का भड़क उठता तो ये शो'ला न दबाया जाता — Altaf Hussain Hali
माँ बाप और उस्ताद सब हैं ख़ुदा की रहमत है रोक-टोक उन की हक़ में तुम्हारे नेमत — Altaf Hussain Hali

Ghazal

वस्ल का उस के दिल-ए-ज़ार तमन्नाई है न मुलाक़ात है जिस से न शनासाई है क़त्अ उम्मीद ने दिल कर दिए यकसू सद शुक्र शक्ल मुद्दत में ये अल्लाह ने दिखलाई है क़ूव्वत-ए-दस्त-ए-ख़ुदाई है शकेबाई में वक़्त जब आ के पड़ा है यही काम आई है डर नहीं ग़ैर का जो कुछ है सो अपना डर है हम ने जब खाई है अपने ही से ज़क खाई है नशे में चूर न हों झाँझ में मख़्मूर न हों पंद ये पीर-ए-ख़राबात ने फ़रमाई है नज़र आती नहीं अब दिल में तमन्ना कोई बा'द मुद्दत के तमन्ना मिरी बर आई है बात सच्ची कही और उँगलियाँ उट्ठीं सब की सच में 'हाली' कोई रुस्वाई सी रुस्वाई है — Altaf Hussain Hali
ग़म-ए-फ़ुर्क़त ही में मरना हो तो दुश्वार नहीं शादी-ए-वस्ल भी आशिक़ को सज़ा-वार नहीं ख़ूब-रूई के लिए ज़िश्ती-ए-ख़ू भी है ज़रूर सच तो ये है कि कोई तुझ सा तरह-दार नहीं क़ौल देने में तअम्मुल न क़सम से इनकार हम को सच्चा नज़र आता कोई इक़रार नहीं कल ख़राबात में इक गोशे से आती थी सदा दिल में सब कुछ है मगर रुख़्सत-ए-गुफ़्तार नहीं हक़ हुआ किस से अदा उस की वफ़ादारी का जिस के नज़दीक जफ़ा बाइस-ए-आज़ार नहीं देखते हैं कि पहुँचती है वहाँ कौन सी राह का'बा ओ दैर से कुछ हम को सरोकार नहीं होंगे क़ाइल वो अभी मतला-ए-सानी सुन कर जो तजल्ली में ये कहते हैं कि तकरार नहीं — Altaf Hussain Hali
जुनूँ कार-फ़रमा हुआ चाहता है क़दम दश्त पैमा हुआ चाहता है दम-ए-गिर्या किस का तसव्वुर है दिल में कि अश्क अश्क दरिया हुआ चाहता है ख़त आने लगे शिकवा-आमेज़ उन के मिलाप उन से गोया हुआ चाहता है बहुत काम लेने थे जिस दिल से हम को वो सर्फ़-ए-तमन्ना हुआ चाहता है अभी लेने पाए नहीं दम जहाँ में अजल का तक़ाज़ा हुआ चाहता है मुझे कल के वादे पे करते हैं रुख़्सत कोई वा'दा पूरा हुआ चाहता है फ़ुज़ूँ तर है कुछ इन दिनों ज़ौक़-ए-इस्याँ दर-ए-रहमत अब वा हुआ चाहता है क़लक़ गर यही है तो राज़-ए-निहानी कोई दिन में रुस्वा हुआ चाहता है वफ़ा शर्त-ए-उल्फ़त है लेकिन कहाँ तक दिल अपना भी तुझ सा हुआ चाहता है बहुत हज़ उठाता है दिल तुझ से मिल कर क़लक़ देखिए क्या हुआ चाहता है ग़म-ए-रश्क को तल्ख़ समझे थे हमदम सो वो भी गवारा हुआ चाहता है बहुत चैन से दिन गुज़रते हैं 'हाली' कोई फ़ित्ना बरपा हुआ चाहता है — Altaf Hussain Hali
दिल को दर्द-आश्ना किया तू ने दर्द-ए-दिल को दवा किया तू ने तब-ए-इंसाँ को दी सिरिश्त-ए-वफ़ा ख़ाक को कीमिया किया तू ने वस्ल-ए-जानाँ मुहाल ठहराया क़त्ल-ए-आशिक़ रवा किया तू ने था न जुज़ ग़म बिसात-ए-आशिक़ में ग़म को राहत-फ़ज़ा किया तू ने जान थी इक वबाल फ़ुर्क़त में शौक़ को जाँ-गुज़ा किया तू ने थी मोहब्बत में नंग मिन्नत-ए-ग़ैर जज़्ब-ए-दिल को रसा किया तू ने राह ज़ाहिद को जब कहीं न मिली दर-ए-मय-ख़ाना वा किया तू ने क़त्अ होने ही जब लगा पैवंद ग़ैर को आश्ना किया तू ने थी जहाँ कारवाँ को देनी राह इश्क़ को रहनुमा किया तू ने नाव भर कर जहाँ डुबोनी थी अक़्ल को नाख़ुदा किया तू ने बढ़ गई जब पिदर को मेहर-ए-पिसर उस को उस से जुदा किया तू ने जब हुआ मुल्क ओ माल रहज़न-ए-होश बादशह को गदा किया तू ने जब मिली काम-ए-जाँ को लज़्ज़त-ए-दर्द दर्द को बे-दवा किया तू ने जब दिया राह-रौ को ज़ौक़-ए-तलब स'ई को ना-रसा किया तू ने पर्दा-ए-चश्म थे हिजाब बहुत हुस्न को ख़ुद-नुमा किया तू ने इश्क़ को ताब-ए-इंतिज़ार न थी ग़ुर्फ़ा इक दिल में वा किया तू ने हरम आबाद और दैर ख़राब जो किया सब बजा किया तू ने सख़्त अफ़्सुर्दा तब्अ' थी अहबाब हम को जादू नवा किया तू ने फिर जो देखा तो कुछ न था या रब कौन पूछे कि क्या किया तू ने 'हाली' उट्ठा हिला के महफ़िल को आख़िर अपना कहा किया तू ने — Altaf Hussain Hali
इश्क़ को तर्क-ए-जुनूँ से क्या ग़रज़ चर्ख़-ए-गर्दां को सुकूँ से क्या ग़रज़ दिल में है ऐ ख़िज़्र गर सिदक़-ए-तलब राह-रौ को रहनुमों से क्या ग़रज़ हाजियो है हम को घर वाले से काम घर के मेहराब ओ सुतूँ से क्या ग़रज़ गुनगुना कर आप रो पड़ते हैं जो उन को चंग ओ अरग़नूँ से क्या ग़रज़ नेक कहना नेक जिस को देखना हम को तफ़्तीश-ए-दरूँ से क्या ग़रज़ दोस्त हैं जब ज़ख़्म-ए-दिल से बे-ख़बर उन को अपने अश्क-ए-ख़ूँ से क्या ग़रज़ इश्क़ से है मुजतनिब ज़ाहिद अबस शे'र को सैद-ए-ज़बूँ से क्या ग़रज़ कर चुका जब शैख़ तस्ख़ीर-ए-क़ुलूब अब उसे दुनिया-ए-दूँ से क्या ग़रज़ आए हो 'हाली' पए-तस्लीम याँ आप को चून-ओ-चगूँ से क्या ग़रज़ — Altaf Hussain Hali
कह दो कोई साक़ी से कि हम मरते हैं प्यासे गर मय नहीं दे ज़हर ही का जाम बला से जो कुछ है सो है उस के तग़ाफ़ुल की शिकायत क़ासिद से है तकरार न झगड़ा है सबास दल्लाला ने उम्मीद दिलाई तो है लेकिन देते नहीं कुछ दिल को तसल्ली ये दिलासे है वस्ल तो तक़दीर के हाथ ऐ शह-ए-ख़ूबाँ याँ हैं तो फ़क़त तेरी मोहब्बत के हैं प्यासे प्यासे तिरे सर-गश्ता हैं जो राह-ए-तलब में होंटों को वो करते नहीं तर आब-ए-बक़ा से दर गुज़रे दवा से तो भरोसे पे दुआ के दर गुज़रें दुआ से भी दुआ है ये ख़ुदा से इक दर्द हो बस आठ पहर दिल में कि जिस को तख़फ़ीफ़ दवा से हो न तस्कीन दुआ से 'हाली' दिल-ए-इंसाँ में है गुम दौलत-ए-कौनैन शर्मिंदा हों क्यूँँ ग़ैर के एहसान-ओ-अता से जब वक़्त पड़े दीजिए दस्तक दर-ए-दिल पर झुकिए फ़ुक़रा से न झम किए उमरा से — Altaf Hussain Hali
है जुस्तुजू कि ख़ूब से है ख़ूब-तर कहाँ अब ठहरती है देखिए जा कर नज़र कहाँ हैं दौर-ए-जाम-ए-अव्वल-ए-शब में ख़ुदी से दूर होती है आज देखिए हम को सहर कहाँ या रब इस इख़्तिलात का अंजाम हो ब-ख़ैर था उस को हम से रब्त मगर इस क़दर कहाँ इक उम्र चाहिए कि गवारा हो नीश-ए-इश्क़ रक्खी है आज लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर कहाँ बस हो चुका बयाँ कसल-ओ-रंज-ए-राह का ख़त का मिरे जवाब है ऐ नामा-बर कहाँ कौन ओ मकाँ से है दिल-ए-वहशी कनारा-गीर इस ख़ानुमाँ-ख़राब ने ढूँडा है घर कहाँ हम जिस पे मर रहे हैं वो है बात ही कुछ और आलम में तुझ से लाख सही तू मगर कहाँ होती नहीं क़ुबूल दुआ तर्क-ए-इश्क़ की दिल चाहता न हो तो ज़बाँ में असर कहाँ 'हाली' नशात-ए-नग़्मा-ओ-मय ढूँढ़ते हो अब आए हो वक़्त-ए-सुब्ह रहे रात भर कहाँ — Altaf Hussain Hali
धूम थी अपनी पारसाई की की भी और किस से आशनाई की क्यूँँ बढ़ाते हो इख़्तिलात बहुत हम को ताक़त नहीं जुदाई की मुँह कहाँ तक छुपाओगे हम से तुम को आदत है ख़ुद-नुमाई की लाग में हैं लगाओ की बातें सुल्ह में छेड़ है लड़ाई की मिलते ग़ैरों से हो मिलो लेकिन हम से बातें करो सफ़ाई की दिल रहा पा-ए-बंद-ए-उल्फ़त-ए-दाम थी अबस आरज़ू रिहाई की दिल भी पहलू में हो तो याँ किस से रखिए उम्मीद दिलरुबाई की शहर ओ दरिया से बाग़ ओ सहरा से बू नहीं आती आशनाई की न मिला कोई ग़ारत-ए-ईमाँ रह गई शर्म पारसाई की बख़्त-ए-हम-दास्तानी-ए-शैदा तू ने आख़िर को ना-रसाई की सोहबत-ए-गाह-गाही-ए-रश्की तू ने भी हम से बे-वफ़ाई की मौत की तरह जिस से डरते थे साअ'त आ पहुँची उस जुदाई की ज़िंदा फिरने की है हवस 'हाली' इंतिहा है ये बे-हयाई की — Altaf Hussain Hali
जीते जी मौत के तुम मुँह में न जाना हरगिज़ दोस्तो दिल न लगाना न लगाना हरगिज़ इश्क़ भी ताक में बैठा है नज़र-बाज़ों की देखना शे'र से आँखें न लड़ाना हरगिज़ हाथ मलने न हों पीरी में अगर हसरत से तो जवानी में न ये रोग बसाना हरगिज़ जितने रस्ते थे तिरे हो गए वीराँ ऐ इश्क़ आ के वीरानों में अब घर न बसाना हरगिज़ कूच सब कर गए दिल्ली से तिरे क़द्र-शनास क़द्र याँ रह के अब अपनी न गँवाना हरगिज़ तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़ न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़ ढूँडता है दिल-ए-शोरीदा बहाने मुतरिब दर्द-अंगेज़ ग़ज़ल कोई न गाना हरगिज़ सोहबतें अगली मुसव्विर हमें याद आएँगी कोई दिलचस्प मुरक़्क़ा न दिखाना हरगिज़ ले के दाग़ आएगा सीने पे बहुत ऐ सय्याह देख इस शहर के खंडरों में न जाना हरगिज़ चप्पे चप्पे पे हैं याँ गौहर-ए-यकता तह-ए-ख़ाक दफ़्न होगा कहीं इतना न ख़ज़ाना हरगिज़ मिट गए तेरे मिटाने के निशाँ भी अब तो ऐ फ़लक इस से ज़ियादा न मिटाना हरगिज़ वो तो भूले थे हमें हम भी उन्हें भूल गए ऐसा बदला है न बदलेगा ज़माना हरगिज़ हम को गर तू ने रुलाया तो रुलाया ऐ चर्ख़ हम पे ग़ैरों को तो ज़ालिम न हँसाना हरगिज़ आख़िरी दौर में भी तुझ को क़सम है साक़ी भर के इक जाम न प्यासों को पिलाना हरगिज़ बख़्त सोए हैं बहुत जाग के ऐ दौर-ए-ज़माँ न अभी नींद के मातों को जगाना हरगिज़ कभी ऐ इल्म ओ हुनर घर था तुम्हारा दिल्ली हम को भूले हो तो घर भूल न जाना हरगिज़ शा'इरी मर चुकी अब ज़िंदा न होगी यारो याद कर कर के उसे जी न कुढ़ाना हरगिज़ 'ग़ालिब' ओ 'शेफ़्ता' ओ 'नय्यर' ओ 'आज़ुर्दा' ओ 'ज़ौक़' अब दिखाएगा ये शक्लें न ज़माना हरगिज़ 'मोमिन' ओ 'अल्वी' ओ 'सहबाई' ओ 'ममनूँ' के बा'द शे'र का नाम न लेगा कोई दाना हरगिज़ कर दिया मर के यगानों ने यगाना हम को वर्ना याँ कोई न था हम में यगाना हरगिज़ 'दाग़' ओ 'मजरूह' को सुन लो कि फिर इस गुलशन में न सुनेगा कोई बुलबुल का तराना हरगिज़ रात आख़िर हुई और बज़्म हुई ज़ेर-ओ-ज़बर अब न देखोगे कभी लुत्फ़-ए-शबाना हरगिज़ बज़्म-ए-मातम तो नहीं बज़्म-ए-सुख़न है 'हाली' याँ मुनासिब नहीं रो रो के रुलाना हरगिज़ — Altaf Hussain Hali
घर है वहशत-ख़ेज़ और बस्ती उजाड़ हो गई एक इक घड़ी तुझ बिन पहाड़ आज तक क़स्र-ए-अमल है ना-तमाम बंध चुकी है बार-हा खुल खुल के पाड़ है पहुँचना अपना चोटी तक मुहाल ऐ तलब निकला बहुत ऊँचा पहाड़ खेलना आता है हम को भी शिकार पर नहीं ज़ाहिद कोई टट्टी की आड़ दिल नहीं रौशन तो हैं किस काम के सौ शबिस्ताँ में अगर रौशन हैं झाड़ ईद और नौरोज़ है सब दिल के साथ दिल नहीं हाज़िर तो दुनिया है उजाड़ खेत रस्ते पर है और रह-रौ सवार किश्त है सरसब्ज़ और नीची है बाड़ बात वाइ'ज़ की कोई पकड़ी गई इन दिनों कम-तर है कुछ हम पर लताड़ तुम ने 'हाली' खोल कर नाहक़ ज़बाँ कर लिया सारी ख़ुदाई से बिगाड़ — Altaf Hussain Hali
हश्र तक याँ दिल शकेबा चाहिए कब मिलें दिलबर से देखा चाहिए है तजल्ली भी नक़ाब-ए-रू-ए-यार उस को किन आँखों से देखा चाहिए ग़ैर-मुमकिन है न हो तासीर-ए-ग़म हाल-ए-दिल फिर उस को लिक्खा चाहिए है दिल-अफ़गारों की दिलदारी ज़रूर गर नहीं उल्फ़त मदारा चाहिए है कुछ इक बाक़ी ख़लिश उम्मीद की ये भी मिट जाए तो फिर क्या चाहिए दोस्तों की भी न हो परवा जिसे बे-नियाज़ी उस की देखा चाहिए भा गए हैं आप के अंदाज़ ओ नाज़ कीजिए इग़्माज़ जितना चाहिए शैख़ है इन की निगह जादू भरी सोहबत-ए-रिंदाँ से बचना चाहिए लग गई चुप 'हाली'-ए-रंजूर को हाल इस का किस से पूछा चाहिए — Altaf Hussain Hali
कब्क ओ क़ुमरी में है झगड़ा कि चमन किस का है कल बता देगी ख़िज़ाँ ये कि वतन किस का है फ़ैसला गर्दिश-ए-दौराँ ने किया है सौ बार मर्व किस का है बदख़शान ओ ख़ुतन किस का है दम से यूसुफ़ के जब आबाद था याक़ूब का घर चर्ख़ कहता था कि ये बैत-ए-हुज़न किस का है मुतमइन इस से मुसलमाँ न मसीही न यहूद दोस्त क्या जानिए ये चर्ख़-ए-कुहन किस का है वाइ'ज़ इक ऐब से तू पाक है या ज़ात-ए-ख़ुदा वर्ना बे-ऐब ज़माने में चलन किस का है आज कुछ और दिनों से है सिवा इस्तिग़राक़ अज़्म-ए-तस्ख़ीर फिर ऐ शेख़-ए-ज़मन किस का है आँख पड़ती है हर इक अहल-ए-नज़र की तुम पर तुम में रूप ऐ गुल ओ नसरीन ओ समन किस का है इश्क़ उधर अक़्ल इधर धुन में चले हैं तेरी रस्ता अब देखिए दोनों में कठिन किस का है शान देखी नहीं गर तू ने चमन में उस की वलवला तुझ में ये ऐ मुर्ग़-ए-चमन किस का है हैं फ़साहत में मसल वाइ'ज़ ओ 'हाली' दोनों देखना ये है कि बे-लाग सुख़न किस का है — Altaf Hussain Hali
मैं तो मैं ग़ैर को मरने से अब इनकार नहीं इक क़यामत है तिरे हाथ में तलवार नहीं कुछ पता मंज़िल-ए-मक़्सूद का पाया हम ने जब ये जाना कि हमें ताक़त-ए-रफ़्तार नहीं चश्म-ए-बद-दूर बहुत फिरते हैं अग़्यार के साथ ग़ैरत-ए-इश्क़ से अब तक वो ख़बर-दार नहीं हो चुका नाज़ उठाने में है गो काम तमाम लिल्लाहिल-हम्द कि बाहम कोई तकरार नहीं मुद्दतों रश्क ने अग़्यार से मिलने न दिया दिल ने आख़िर ये दिया हुक्म कि कुछ आर नहीं अस्ल मक़्सूद का हर चीज़ में मिलता है पता वर्ना हम और किसी शय के तलबगार नहीं बात जो दिल में छुपाते नहीं बनती 'हाली' सख़्त मुश्किल है कि वो क़ाबिल-ए-इज़हार नहीं — Altaf Hussain Hali
ख़ूबियाँ अपने में गो बे-इंतिहा पाते हैं हम पर हर इक ख़ूबी में दाग़ इक ऐब का पाते हैं हम ख़ौफ़ का कोई निशाँ ज़ाहिर नहीं अफ़आ'ल में गो कि दिल में मुत्तसिल ख़ौफ़-ए-ख़ुदा पाते हैं हम करते हैं ताअ'त तो कुछ ख़्वाहाँ नुमाइश के नहीं पर गुनह छुप छुप के करने में मज़ा पाते हैं हम दीदा ओ दिल को ख़यानत से नहीं रख सकते बाज़ गरचे दस्त-ओ-पा को अक्सर बे-ख़ता पाते हैं हम दिल में दर्द-ए-इश्क़ ने मुद्दत से कर रक्खा है घर पर उसे आलूदा-ए-हिर्स-ओ-हवा पाते हैं हम हो के नादिम जुर्म से फिर जुर्म करते हैं वही जुर्म से गो आप को नादिम सदा पाते हैं हम हैं फ़िदा उन दोस्तों पर जिन में हो सिद्क़ ओ सफ़ा पर बहुत कम आप में सिद्क़ ओ सफ़ा पाते हैं हम गो किसी को आप से होने नहीं देते ख़फ़ा इक जहाँ से आप को लेकिन ख़फ़ा पाते हैं हम जानते अपने सिवा सब को हैं बे-मेहर ओ वफ़ा अपने में गर शम्मा-ए-मेहर-ओ-वफ़ा पाते हैं हम बुख़्ल से मंसूब करते हैं ज़माने को सदा गर कभी तौफ़ीक़-ए-ईसार ओ अता पाते हैं हम हो अगर मक़्सद में नाकामी तो कर सकते हैं सब्र दर्द-ए-ख़ुद-कामी को लेकिन बे-दवा पाते हैं हम ठहरते जाते हैं जितने चश्म-ए-आलम में भले हाल नफ़्स-ए-दूँ का उतना ही बुरा पाते हैं हम जिस क़दर झुक झुक के मिलते हैं बुज़ुर्ग ओ ख़ुर्द से किब्र ओ नाज़ उतना ही अपने में सिवा पाते हैं हम गो भलाई कर के हम-जिंसों से ख़ुश होता है जी तह-नशीं उस में मगर दुर्द-ए-रिया पाते हैं हम है रिदा-ए-नेक-नामी दोश पर अपने मगर दाग़ रुस्वाई के कुछ ज़ेर-ए-रिदा पाते हैं हम राह के तालिब हैं पर बे-राह पड़ते हैं क़दम देखिए क्या ढूँढ़ते हैं और क्या पाते हैं हम नूर के हम ने गले देखे हैं ऐ 'हाली' मगर रंग कुछ तेरी अलापों में नया पाते हैं हम — Altaf Hussain Hali
हक़ वफ़ा के जो हम जताने लगे आप कुछ कह के मुस्कुराने लगे था यहाँ दिल में तान-ए-वस्ल-ए-अदू उज़्र उन की ज़बाँ पे आने लगे हम को जीना पड़ेगा फ़ुर्क़त में वो अगर हिम्मत आज़माने लगे डर है मेरी ज़बाँ न खुल जाए अब वो बातें बहुत बनाने लगे जान बचती नज़र नहीं आती ग़ैर उल्फ़त बहुत जताने लगे तुम को करना पड़ेगा उज़्र-ए-जफ़ा हम अगर दर्द-ए-दिल सुनाने लगे सख़्त मुश्किल है शेवा-ए-तस्लीम हम भी आख़िर को जी चुराने लगे जी में है लूँ रज़ा-ए-पीर-ए-मुग़ाँ क़ाफ़िले फिर हरम को जाने लगे सिर्र-ए-बातिन को फ़ाश कर या रब अहल-ए-ज़ाहिर बहुत सताने लगे वक़्त-ए-रुख़्सत था सख़्त 'हाली' पर हम भी बैठे थे जब वो जाने लगे — Altaf Hussain Hali
दिल से ख़याल-ए-दोस्त भुलाया न जाएगा सीने में दाग़ है कि मिटाया न जाएगा तुम को हज़ार शर्म सही मुझ को लाख ज़ब्त उल्फ़त वो राज़ है कि छुपाया न जाएगा ऐ दिल रज़ा-ए-ग़ैर है शर्त-ए-रज़ा-ए-दोस्त ज़िन्हार बार-ए-इश्क़ उठाया न जाएगा देखी हैं ऐसी उन की बहुत मेहरबानियाँ अब हम से मुँह में मौत के जाया न जाएगा मय तुंद ओ ज़र्फ़-ए-हौसला-ए-अहल-ए-बज़्म तंग साक़ी से जाम भर के पिलाया न जाएगा राज़ी हैं हम कि दोस्त से हो दुश्मनी मगर दुश्मन को हम से दोस्त बनाया न जाएगा क्यूँँ छेड़ते हो ज़िक्र न मिलने का रात के पूछेंगे हम सबब तो बताया न जाएगा बिगड़ें न बात बात पे क्यूँँ जानते हैं वो हम वो नहीं कि हम को मनाया न जाएगा मिलना है आप से तो नहीं हस्र ग़ैर पर किस किस से इख़्तिलात बढ़ाया न जाएगा मक़्सूद अपना कुछ न खुला लेकिन इस क़दर या'नी वो ढूँडते हैं जो पाया न जाएगा झगड़ों में अहल-ए-दीं के न 'हाली' पड़ें बस आप क़िस्सा हुज़ूर से ये चुकाया न जाएगा — Altaf Hussain Hali

Nazm

ऐ वतन ऐ मिरे बहिश्त-ए-बरीँ क्या हुए तेरे आसमान ज़मीं रात और दिन का वो समाँ न रहा वो ज़मीं और वो आसमाँ न रहा सच बता तू सभी को भाता है या कि मुझ से ही तेरा नाता है मैं ही करता हूँ तुझ पे जान-निसार या कि दुनिया है तेरी आशिक़-ए-ज़ार क्या ज़माने को तू अज़ीज़ नहीं ऐ वतन तू तो ऐसी चीज़ नहीं जिन्न-ओ-इंसान की हयात है तू मुर्ग़-ओ-माही की काएनात है तू है नबातात का नुमू तुझ से रूख तुझ बिन हरे नहीं होते सब को होता है तुझ से नशो-ओ-नुमा सब को भाती है तेरी आब-ओ-हवा तेरी इक मुश्त-ए-ख़ाक के बदले लूँ न हरगिज़ अगर बहिश्त मिले जान जब तक न हो बदन से जुदा कोई दुश्मन न हो वतन से जुदा बैठे बे-फ़िक्र क्या हो हम-वतनो उट्ठो अहल-ए-वतन के दोस्त बनो तुम अगर चाहते हो मुल्क की ख़ैर न किसी हम-वतन को समझो ग़ैर हों मुसलमान इस में या हिन्दू बोध मज़हब हो या कि हो ब्रहमू सब को मीठी निगाह से देखो समझो आँखों की पुतलियाँ सब को मुल्क हैं इत्तिफ़ाक़ से आज़ाद शहर हैं इत्तिफ़ाक़ से आबाद हिन्द में इत्तिफ़ाक़ होता अगर खाते ग़ैरों की ठोकरें क्यूँँकर क़ौम जब इत्तिफ़ाक़ खो बैठी अपनी पूँजी से हाथ धो बैठी एक का एक हो गया बद-ख़्वाह लगी ग़ैरों की तुम पे पड़ने निगाह फिर गए भाइयों से जब भाई जो न आनी थी वो बला आई पाँव इक़बाल के उखड़ने लगे मुल्क पर सब के हाथ पड़ने लगे कभी तूरानियों ने घर लूटा कभी दुर्रानियों ने ज़र लूटा कभी नादिर ने क़त्ल-ए-आम किया कभी महमूद ने ग़ुलाम किया सब से आख़िर को ले गई बाज़ी एक शाइस्ता क़ौम मग़रिब की मुल्क रौंदे गए हैं पैरों से चैन किस को मिला ही ग़ैरों से छोड़ो अफ़्सुर्दगी को जोश में आओ बस बहुत सोए उट्ठो होश में आओ क़ाफ़िले तुम से बढ़ गए कोसों रहे जाते हो सब से पीछे क्यूँँ क़ाफ़िलों से अगर मिला चाहो मुल्क और क़ौम का भला चाहो गर रहा चाहते हो इज़्ज़त से भाइयों को निकालो ज़िल्लत से क़ौम का मुब्तज़िल है जो इंसाँ बे-हक़ीक़त है गरचे है सुल्ताँ क़ौम दुनिया में जिस की है मुम्ताज़ हो फ़क़ीरी में भी वो बा-एज़ाज़ इज़्ज़त-ए-क़ौम चाहते हो अगर जा के फैलाओ इन में इल्म-ओ-हुनर ज़ात का फ़ख़्र और नसब का ग़ुरूर उठ गए अब जहाँ से ये दस्तूर अब न सय्यद का इफ़्तिख़ार सहीह न बरहमन को शुद्र पर तरजीह क़ौम की इज़्ज़त अब हुनर से है इल्म से या कि सीम-ओ-ज़र से है कोई दिन में वो दौर आएगा बे-हुनर भीक तक न पाएगा न रहेंगे सदा यही दिन-रात याद रखना हमारी आज की बात गर नहीं सुनते क़ौल 'हाली' का फिर न कहना कि कोई कहता था — Altaf Hussain Hali
ऐ सिपहर-ए-बरीं के सय्यारो ऐ फ़ज़ा-ए-ज़मीं के गुल-ज़ारो ऐ पहाड़ों की दिल-फ़रेब फ़ज़ा ऐ लब-ए-जू की ठंडी ठंडी हवा ऐ अनादिल के नग़मा-ए-सहरी ऐ शब-ए-माहताब तारों भरी ऐ नसीम-ए-बहार के झोंको दहर-ए-ना-पाएदार के धोको तुम हर इक हाल में हो यूँँ तो अज़ीज़ थे वतन में मगर कुछ और ही चीज़ जब वतन में हमारा था रमना तुम से दिल बाग़ बाग़ था अपना तुम मिरी दिल-लगी के सामाँ थे तुम मिरे दर्द-ए-दिल के दरमाँ थे तुम से कटता था रंज-ए-तन्हाई तुम से पाता था दिल शकेबाई आन इक इक तुम्हारी भाती थी जो अदा थी वो जी लुभाती थी करते थे जब तुम अपनी ग़म-ख़्वारी धोई जाती थीं कुलफ़तें सारी जब हवा खाने बाग़ जाते थे हो के ख़ुश-हाल घर में आते थे बैठ जाते थे जब कभी लब-ए-आब धो के उठते थे दिल के दाग़ शिताब कोह ओ सहरा ओ आसमान ओ ज़मीं सब मिरी दिल-लगी की शक्लें थीं पर छुटा जिस से अपना मुल्क ओ दयार जी हुआ तुम से ख़ुद-ब-ख़ुद बेज़ार न गुलों की अदा ख़ुश आती है न सदा बुलबुलों की भाती है सैर-ए-गुलशन है जी का इक जंजाल शब-ए-महताब जान को है वबाल कोह ओ सहरा से ता लब-ए-दरिया जिस तरफ़ जाएँ जी नहीं लगता क्या हुए वो दिन और वो रातें तुम में अगली सी अब नहीं बातें हम ही ग़ुर्बत में हो गए कुछ और या तुम्हारे बदल गए कुछ तौर गो वही हम हैं और वही दुनिया पर नहीं हम को लुत्फ़ दुनिया का ऐ वतन ऐ मिरे बहिश्त-ए-बरीँ क्या हुए तेरे आसमान ओ ज़मीं रात और दिन का वो समाँ न रहा वो ज़मीं और वो आसमाँ न रहा तेरी दूरी है मोरिद-ए-आलाम तेरे छुटने से छुट गया आराम काटे खाता है बाग़ बिन तेरे गुल हैं नज़रों में दाग़ बिन तेरे मिट गया नक़्श कामरानी का तुझ से था लुत्फ़ ज़िंदगानी का जो कि रहते हैं तुझ से दूर सदा इन को क्या होगा ज़िंदगी का मज़ा हो गया याँ तो दो ही दिन में ये हाल तुझ बिन एक एक पल है इक इक साल सच बता तो सभी को भाता है या कि मुझ से ही तेरा नाता है मैं ही करता हूँ तुझ पे जान निसार या कि दुनिया है तेरी आशिक़-ए-ज़ार क्या ज़माने को तू अज़ीज़ नहीं ऐ वतन तू तो ऐसी चीज़ नहीं जिन ओ इंसान की हयात है तू मुर्ग़ ओ माही की काएनात है तू है नबातात का नुमू तुझ से रूख तुझ बिन हरे नहीं होते सब को होता है तुझ से नश्व-ओ-नुमा सब को भाती है तेरी आब-ओ-हवा तेरी इक मुश्त-ए-ख़ाक के बदले लूँ न हरगिज़ अगर बहिश्त मिले जान जब तक न हो बदन से जुदा कोई दुश्मन न हो वतन से हवा हमला जब क़ौम-ए-आर्या ने किया और बजा उन का हिन्द में डंका मुल्क वाले बहुत से काम आए जो बचे वो ग़ुलाम कहलाए शुद्र कहलाए राक्षस कहलाए रंज परदेस के मगर न उठाए गो ग़ुलामी का लग गया धब्बा न छुटा उन से देस पर न छुटा क़द्र ऐ दिल वतन में रहने की पूछे परदेसियों के जी से कोई जब मिला राम-चंद्र को बन-बास और निकला वतन से हो के उदास बाप का हुक्म रख लिया सर पर पर चला साथ ले के दाग़-ए-जिगर पाँव उठता था उस का बन की तरफ़ और खिंचता था दिल वतन की तरफ़ गुज़रे ग़ुर्बत में इस क़दर मह-ओ-साल पर न भोला अयोध्या का ख़याल देस को बन में जी भटकता रहा दिल में काँटा सा इक खटकता रहा तीर इक दिल में आ के लगता था आती थी जब अयोध्या की हवा कटने चौदह बरस हुए थे मुहाल गोया एक एक जुग था एक इक साल हुए यसरिब की सम्त जब राही सय्यद-ए-अबतही के हमराही रिश्ते उल्फ़त के सारे तोड़ चले और बिल्कुल वतन को छोड़ चले गो वतन से चले थे हो के ख़फ़ा पर वतन में था सब का जी अटका दिल-लगी के बहुत मिले सामान पर न भूले वतन के रेगिस्तान दिल में आठों पहर खटकते थे संग-रेज़े ज़मीन-ए-बतहा के घर जफ़ाओं से जिन की छूटा था दिल से रिश्ता न उन का टूटा था हुईं यूसुफ़ की सख़्तियाँ जब दूर और हुआ मुल्क-ए-मिस्र पर मामूर मिस्र में चार सू था हुक्म रवाँ आँख थी जानिब-ए-वतन निगराँ याद-ए-कनआँ जब उस को आती थी सल्तनत सारी भूल जाती थी दुख उठाए थे जिस वतन में सख़्त ताज भाता न उस बग़ैर न तख़्त जिन से देखी थी सख़्त बे-मेहरी लौ थी उन भाइयों की दिल को लगी हम भी हुब्ब-ए-वतन में हैं गो ग़र्क़ हम में और उन में है मगर ये फ़र्क़ हम हैं नाम-ए-वतन के दीवाने वो थे अहल-ए-वतन के परवाने जिस ने यूसुफ़ की दास्ताँ है सुनी जानता होगा रूएदाद उस की मिस्र में क़हत जब पड़ा आ कर और हुई क़ौम भूक से मुज़्तर कर दिया वक़्फ़ उन पे बैतुलमाल लब तक आने दिया न हर्फ़-ए-सवाल खतियाँ और कोठे खोल दिए मुफ़्त सारे ज़ख़ीरे तोल दिए क़ाफ़िले ख़ाली हाथ आते थे और भरपूर याँ से जाते थे यूँँ गए क़हत के वो साल गुज़र जैसे बच्चों की भूक वक़्त-ए-सहर ऐ दिल ऐ बंदा-ए-वतन होशियार ख़्वाब-ए-ग़फ़लत से हो ज़रा बेदार ओ शराब-ए-ख़ुदी के मतवाले घर की चौखट के चूमने वाले नाम है क्या इसी का हुब्ब-ए-वतन जिस की तुझ को लगी हुई है लगन कभी बच्चों का ध्यान आता है कभी यारों का ग़म सताता है याद आता है अपना शहर कभी लौ कभी अहल-ए-शहर की है लगी नक़्श हैं दिल पे कूचा-ओ-बाज़ार फिरते आँखों में हैं दर-ओ-दीवार क्या वतन क्या यही मोहब्बत है ये भी उल्फ़त में कोई उल्फ़त है इस में इंसाँ से कम नहीं हैं दरिंद इस से ख़ाली नहीं चरिंद ओ परिंद टुकड़े होते हैं संग ग़ुर्बत में सूख जाते हैं रूख फ़ुर्क़त में जा के काबुल में आम का पौदा कभी परवान चढ़ नहीं सकता आ के काबुल से याँ बिही-ओ-अनार हो नहीं सकते बारवर ज़िन्हार मछली जब छूटती है पानी से हाथ धोती है ज़िंदगानी से आग से जब हुआ समुंदर दूर उस को जीने का फिर नहीं मक़्दूर घोड़े जब खेत से बिछड़ते हैं जान के लाले उन के पड़ते हैं गाए, भैंस ऊँट हो या बकरी अपने अपने ठिकाने ख़ुश हैं सभी कहिए हुब्ब-ए-वतन इसी को अगर हम से हैवाँ नहीं हैं कुछ कम-तर है कोई अपनी क़ौम का हमदर्द नौ-ए-इंसाँ का समझें जिस को फ़र्द जिस पे इतलाक़-ए-आदमी हो सहीह जिस को हैवाँ पे दे सकें तरजीह क़ौम पर कोई ज़द न देख सके क़ौम का हाल-ए-बद न देख सके क़ौम से जान तक अज़ीज़ न हो क़ौम से बढ़ के कोई चीज़ न हो समझे उन की ख़ुशी को राहत-ए-जाँ वाँ जो नौ-रोज़ हो तो ईद हो याँ रंज को उन के समझे माया-ए-ग़म वाँ अगर सोग हो तो याँ मातम भूल जाए सब अपनी क़द्र-ए-जलील देख कर भाइयों को ख़्वार-ओ-ज़लील जब पड़े उन पे गर्दिश-ए-अफ़्लाक अपनी आसाइशों पे डाल दे ख़ाक बैठे बे-फ़िक्र क्या हो हम-वतनो उठो अहल-ए-वतन के दोस्त बनो मर्द हो तुम किसी के काम आओ वर्ना खाओ पियो चले जाओ जब कोई ज़िंदगी का लुत्फ़ उठाओ दिल को दुख भाइयों के याद दिलाओ पहनो जब कोई उम्दा तुम पोशाक करो दामन से ता गरेबाँ चाक खाना खाओ तो जी में तुम शरमाओ ठंडा पानी पियो तो अश्क बहाओ कितने भाई तुम्हारे हैं नादार ज़िंदगी से है जिन का दिल बेज़ार नौकरों की तुम्हारे जो है ग़िज़ा उन को वो ख़्वाब में नहीं मिलता जिस पे तुम जूतियों से फिरते हो वाँ मुयस्सर नहीं वो ओढ़ने को खाओ तो पहले लो ख़बर उन की जिन पे बिपता है नीस्ती की पड़ी पहनो तो पहले भाइयों को पहनाओ कि है उतरन तुम्हारी जिन का बनाव एक डाली के सब हैं बर्ग-ओ-समर है कोई उन में ख़ुश्क और कोई तर सब को है एक अस्ल से पैवंद कोई आज़ुर्दा है कोई ख़ुरसंद मुक़बिलो! मुदब्बिरों को याद करो ख़ुश-दिलो ग़म-ज़दों को शाद करो जागने वाले ग़ाफ़िलों को जगाओ तैरने वालो डूबतों को तिराओ हैं मिले तुम को चश्म ओ गोश अगर लो जो ली जाए कोर-ओ-कर की ख़बर तुम अगर हाथ पाँव रखते हो लंगड़े लूलों को कुछ सहारा दो तंदुरुस्ती का शुक्र किया है बताओ रंज बीमार भाइयों का हटाओ तुम अगर चाहते हो मुल्क की ख़ैर न किसी हम-वतन को समझो ग़ैर हो मुसलमान उस में या हिन्दू बोध मज़हब हो या कि हो ब्रहमू जाफ़री होवे या कि हो हनफ़ी जीन-मत होवे या हो वैष्णवी सब को मीठी निगाह से देखो समझो आँखों की पुतलियाँ सब को मुल्क हैं इत्तिफ़ाक़ से आज़ाद शहर हैं इत्तिफ़ाक़ से आबाद हिन्द में इत्तिफ़ाक़ होता अगर खाते ग़ैरों की ठोकरें क्यूँँकर क़ौम जब इत्तिफ़ाक़ खो बैठी अपनी पूँजी से हात धो बैठी एक का एक हो गया बद-ख़्वाह लगी ग़ैरों की पड़ने तुम पे निगाह फिर गए भाइयों से जब भाई जो न आनी थी वो बला आई पाँव इक़बाल के उखड़ने लगे मुल्क पर सब के हाथ पड़ने लगे कभी तूरानियों ने घर लूटा कभी दुर्रानियों ने ज़र लूटा कभी नादिर ने क़त्ल-ए-आम किया कभी महमूद ने ग़ुलाम किया सब से आख़िर को ले गई बाज़ी एक शाइस्ता क़ौम मग़रिब की ये भी तुम पर ख़ुदा का था इनआ'म कि पड़ा तुम को ऐसी क़ौम से काम वर्ना दुम मारने न पाते तुम पड़ती जो सर पे वो उठाते तुम मुल्क रौंदे गए हैं पैरों से चैन किस को मिला है ग़ैरों से क़ौम से जो तुम्हारे बरताव सोचो ऐ मेरे प्यारो और शरमाओ अहल-ए-दौलत को है ये इस्तिग़्ना कि नहीं भाइयों की कुछ पर्वा शहर में क़हत की दुहाई है जान-ए-आलम लबों पे आई है बच्चे इक घर में बिलबिलाते हैं रो के माँ बाप को रुलाते हैं कोई फिरता है माँगता दर दर है कहीं पेट से बँधा पत्थर पर जो हैं उन में साहिब-ए-मक़्दूर उन में गिनती के होंगे ऐसे ग़यूर कि जिन्हें भाइयों का ग़म होगा अपनी राहत का ध्यान कम होगा जितने देखोगे पाओगे बे-दर्द दिल के नामर्द और नाम के मर्द ऐश में जिन के कटते हैं औक़ात ईद है दिन तो शब्बरात है रात क़ौम मरती है भूक से तो मरे काम उन्हें अपने हलवे-मांडे से इन को अब तक ख़बर नहीं असलन शहर में भाव क्या है ग़ल्ले का ग़ल्ला अर्ज़ां है इन दिनों कि गिराँ काल है शहर में पड़ा कि समाँ काल क्या शय है किस को कहते हैं भूक भूक में क्यूँँकि मरते हैं मफ़लूक सर भूके की क़द्र क्या समझे उस के नज़दीक सब हैं पेट भरे अहल-ए-दौलत का सुन चुके तुम हाल अब सुनो रुएदाद-ए-अहल-ए-कमाल फ़ाज़िलों को है फ़ाज़िलों से इनाद पंडितों में पड़े हुए हैं फ़साद है तबीबों में नोक-झोक सदा एक से एक का है थूक जुदा रहने दो अह-ए-इल्म हैं इस तरह पहलवानों में लाग हो जिस तरह ईदू वालों का है अगर पट्ठा शेख़ू वालों में जा नहीं सकता शाइरों में भी है यही तकरार ख़ुशनवेशों को है यही आज़ार लाख नेकों का क्यूँँ न हो इक नेक देख सकता नहीं है एक को एक इस पे तुर्रा ये है कि अहल-ए-हुनर दूर समझे हुए हैं अपना घर मिली इक गाँठ जिस को हल्दी की उस ने समझा कि मैं हूँ पंसारी नुस्ख़ा इक तिब का जिस को आता है सगे-भाई से वो छुपाता है जिस को आता है फूँकना कुश्ता है हमारी तरफ़ से वो गूँगा जिस को है कुछ रमल में मालूमात वो नहीं करता सीधे मुँह से बात बाप भाई हो या कि हो बेटा भेद पाता नहीं मुनज्जम का काम कंदले का जिस को है मालूम है ज़माने में उस की बुख़्ल की धूम अल-ग़रज़ जिस के पास है कुछ चीज़ जान से भी सिवा है उस को अज़ीज़ क़ौम पर उन का कुछ नहीं एहसाँ उन का होना न होना है यकसाँ सब कमालात और हुनर उन के क़ब्र में उन के साथ जाएँगे क़ौम क्या कह के उन को रोएगी नाम पर क्यूँँ कि जान खोएगी तरबियत-याफ़्ता हैं जो याँ के ख़्वाह बी-ए हों इस में या एम-ए भरते हुब्ब-ए-वतन का गो दम हैं पर मुहिब्ब-ए-वतन बहुत कम हैं क़ौम को उन से जो उमीदें थीं अब जो देखा तो सब ग़लत निकलीं हिस्ट्री उन की और जियोग्राफी सात पर्दे में मुँह दिए है पड़ी बंद उस क़ुफ़्ल में है इल्म उन का जिस की कुंजी का कुछ नहीं है पता लेते हैं अपने दिल ही दिल में मज़े गोया गूँगे का गुड़ हैं खाए हुए करते फिरते हैं सैर-ए-गुल तन्हा कोई पास उन के जा नहीं सकता अहल-ए-इंसाफ़ शर्म की जा है गर नहीं बुख़्ल ये तो फिर क्या है तुम ने देखा है जो वो सब को दिखाओ तुम ने चखा है जो वो सब को चखाओ ये जो दौलत तुम्हारे पास है आज हम-वतन इस के हैं बहुत मोहताज मुँह को एक इक तुम्हारे है तकता कि निकलता है मुँह से आप के क्या आप शाइस्ता हैं तो अपने लिए कुछ सुलूक अपनी क़ौम से भी किए मेज़ कुर्सी अगर लगाते हैं आप क़ौम से पूछिए तो पुन है न पाप मुँडा जूता गर आप को है पसंद क़ौम को इस से फ़ाएदा न गज़ंद क़ौम पर करते हो अगर एहसाँ तो दिखाओ कुछ अपना जोश-ए-निहाँ कुछ दिनों ऐश में ख़लल डालो पेट में जो है सब उगल डालो इल्म को कर दो कू-ब-कू अर्ज़ां हिन्द को कर दिखाओ इंगलिस्ताँ सुनते हो सामईन-ए-बा-तमकीं सुनते हो हाज़रीन-ए-सद्र-नशीं जो हैं दुनिया में क़ौम के हमदर्द बंदा-ए-क़ाैम उन के हैं ज़न ओ मर्द बाप की है दुआ ये बहर-ए-पिसर क़ौम की मैं बनाऊँ उस को सिपर माँ ख़ुदा से ये माँगती है मुराद क़ौम पर से निसार हो औलाद भाई आपस में करते हैं पैमाँ तू अगर माल दे तो मैं दूँ जाँ अहल-ए-हिम्मत कमा के लाते हैं हम-वतन फ़ाएदे उठाते हैं कहीं होते हैं मदरसे जारी दख़्ल और ख़र्ज जिन के हैं भारी और कहीं होते हैं कलब क़ाएम मबहस-ए-हिकमत और अदब क़ाएम नित-नए खुलते हैं दवा-ख़ाने बनते हैं सैकड़ों शिफ़ा-ख़ाने मुल्क में जो मरज़ हैं आलम-गीर क़ौम पर उन की फ़र्ज़ है तदबीर हैं सदा इस उधेड़-बुन में तबीब कि कोई नुस्ख़ा हाथ आए अजीब क़ौम को पहुँचे मंफ़अत जिस से मुल्क में फैलें फ़ाएदे जिस के खप गए कितने बन के झाड़ों में मर गए सैकड़ों पहाड़ों में लिखे जब तक जिए सफ़र-नामे चल दिए हाथ में क़लम था में गो सफ़र में उठाए रंज-ए-कमाल कर दिया पर वतन को अपने निहाल हैं अब इन के गवाह हुब्ब-ए-वतन दर-ओ-दीवार-ए-पैरिस ओ लंदन काम हैं सब बशर के हम-वतनों तुम से भी हो सके तो मर्द बनो छोड़ो अफ़्सुर्दगी को जोश में आओ बस बहुत सोए उट्ठो होश में आओ क़ाफ़िले तुम से बढ़ गए कोसों रहे जाते हो सब से पीछे क्यूँँ क़ाफ़िलों से अगर मिला चाहो मुल्क और क़ौम का भला चाहो गर रहा चाहते हो इज़्ज़त से भाइयों को निकालो ज़िल्लत से उन की इज़्ज़त तुम्हारी इज़्ज़त है उन की ज़िल्लत तुम्हारी ज़िल्लत है क़ौम का मुब्तदिल है जो इंसाँ बे-हक़ीक़त है गरचे है सुल्ताँ क़ौम दुनिया में जिस की है मुम्ताज़ है फ़क़ीरी में भी वो बा-एज़ाज़ इज़्ज़त-ए-क़ौम चाहते हो अगर जा के फैलाओ उन में इल्म-ओ-हुनर ज़ात का फ़ख़्र और नसब का ग़ुरूर उठ गए अब जहाँ से ये दस्तूर अब न सय्यद का इफ़्तिख़ार सहीह न बरहमन को शुद्र पर तरजीह हुई तुर्की तमाम ख़ानों में कट गई जड़ से ख़ानदानों में क़ौम की इज़्ज़त अब हुनर से है इल्म से या कि सीम-ओ-ज़र से है कोई दिन में वो दौर आएगा बे-हुनर भीक तक न पाएगा न रहेंगे सदा यही दिन रात याद रखना हमारी आज की बात गर नहीं सुनते क़ौल 'हाली' का फिर न कहना कि कोई कहता था — Altaf Hussain Hali