Ammar Iqbal

Top 10 of Ammar Iqbal

    मुझको इस लफ़्ज़ का मतलब नहीं मालूम मगर
    आपकी हम्म ने मुझे सोच में डाला हुआ है
    Ammar Iqbal
    82 Likes
    बात मैं सरसरी नहीं करता
    और वज़ाहत कभी नहीं करता

    एक ही बात मुझमें अच्छी है
    और मैं बस वही नहीं करता

    मुझको कैसे मिले भला फुर्सत
    मैं कोई काम ही नहीं करता

    आप ही लोग मार देते हैं
    कोई भी खुदकुशी नहीं करता

    एक जुगनू है तेरी यादों का
    जो कभी रौशनी नहीं करता
    Read Full
    Ammar Iqbal
    36 Likes
    "मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं"
    मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं
    मेरे पेच खुल चुके हैं मेरे ख़म बिगड़ रहे हैं
    कहीं चुपके चुपके चुपके मेरी बात चल रही है
    कहीं कुछ अज़ीज़ मेरे, मेरे पावँ पड़ रहे हैं
    मेरा काम कर चुका है, मेरा ख़्वाब मर चुका है
    मेरी ख़ुश्क ख़ुश्क आँखों में सराब गड़ रहे हैं
    मेरी पसलियाँ चटक कर मेरे मुँह को आ गई हैं
    ग़म-ए-तिश्नगी के मारे मेरे दाँत झड़ रहे हैं
    मेरी आस्तीं फटी है मुझे चोट लग रही है
    मेरी धज्जियाँ उड़ी हैं, मेरे तार उधड़ रहे हैं
    मेरे ख़ून की सफ़ेदी तुम्हें क्या बता रही है
    ये मुझे जता रही है, मेरे ज़ख़्म सड़ रहे हैें
    मेरे सर पे चढ़ के अब तक वही ख़ौफ़ नाचता है
    कि तू कब का जा चुका है कि तू कब का जा चुका है
    Read Full
    Ammar Iqbal
    8
    17 Likes
    अक्स कितने उतर गए मुझ में
    फिर न जाने किधर गए मुझ में

    मैं ने चाहा था ज़ख़्म भर जाएँ
    ज़ख़्म ही ज़ख़्म भर गए मुझ में

    मैं वो पल था जो खा गया सदियाँ
    सब ज़माने गुज़र गए मुझ में

    ये जो मैं हूँ ज़रा सा बाक़ी हूँ
    वो जो तुम थे वो मर गए मुझ में

    मेरे अंदर थी ऐसी तारीकी
    आ के आसेब डर गए मुझ में

    पहले उतरा मैं दिल के दरिया में
    फिर समंदर उतर गए मुझ में

    कैसा मुझ को बना दिया 'अम्मार'
    कौन सा रंग भर गए मुझ में
    Read Full
    Ammar Iqbal
    21 Likes
    रंग-ओ-रस की हवस और बस
    मसअला दस्तरस और बस

    यूँ बुनी हैं रगें जिस्म की
    एक नस टस से मस और बस
    Read Full
    Ammar Iqbal
    68 Likes
    इसी फ़कीर की गफ़लत से आगही ली है
    मेरे चराग़ से सूरज ने रौशनी ली है

    गली-गली में भटकता है शोर करता हुआ
    हमारे इश्क़ ने सस्ती शराब पी ली है
    Read Full
    Ammar Iqbal
    36 Likes
    आखिरश पाक हो गया किस्सा
    ख़ाक था ख़ाक हो गया किस्सा

    खा रहा है जने हुए अपने
    कितना सफ़्फ़ाक हो गया किस्सा

    अब बचा हूं मैं आखिरी किरदार
    अब खतरनाक हो गया किस्सा
    Read Full
    Ammar Iqbal
    8 Likes
    वहशत के कारखाने से ताज़ा ग़ज़ल निकाल
    ऐ सब्र के दरख़्त मेरा मीठा फल निकाल
    Ammar Iqbal
    41 Likes
    एक दरवेश को तिरी ख़ातिर
    सारी बस्ती से इश्क़ हो गया है
    Ammar Iqbal
    43 Likes
    मैंने चाहा था ज़ख़्म भर जाएँ
    ज़ख़्म ही ज़ख़्म भर गए मुझ में
    Ammar Iqbal
    92 Likes

Top 10 of Similar Writers