meraa rang ud raha hai mere baal jhad rahe hain | "मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं"

  - Ammar Iqbal

"मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं"

मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं
मेरे पेच खुल चुके हैं मेरे ख़म बिगड़ रहे हैं
कहीं चुपके चुपके चुपके मेरी बात चल रही है
कहीं कुछ अज़ीज़ मेरे, मेरे पावँ पड़ रहे हैं
मेरा काम कर चुका है, मेरा ख़्वाब मर चुका है
मेरी ख़ुश्क ख़ुश्क आँखों में सराब गड़ रहे हैं
मेरी पसलियाँ चटक कर मेरे मुँह को आ गई हैं
ग़म-ए-तिश्नगी के मारे मेरे दाँत झड़ रहे हैं
मेरी आस्तीं फटी है मुझे चोट लग रही है
मेरी धज्जियाँ उड़ी हैं, मेरे तार उधड़ रहे हैं
मेरे ख़ून की सफ़ेदी तुम्हें क्या बता रही है
ये मुझे जता रही है, मेरे ज़ख़्म सड़ रहे हैें
मेरे सर पे चढ़ के अब तक वही ख़ौफ़ नाचता है
कि तू कब का जा चुका है कि तू कब का जा चुका है

  - Ammar Iqbal

Dar Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Ammar Iqbal

As you were reading Shayari by Ammar Iqbal

Similar Writers

our suggestion based on Ammar Iqbal

Similar Moods

As you were reading Dar Shayari Shayari