"जुदाई"

जिन दिनों में तुम ने देखा था मुझे
मैं उन दिनों किसी गुलाब जैसा खिल रहा था महक रहा था
तुम्हारे इश्क़ का गुलाबी जाम मेरे नर्म चेहरे पे बह रहा था
मगर अब के यूँ है बिछड़ के तुम से तुम्हारे हिज्र ए मलाल से मैं
उजड़ गया हूँ
तुम्हारी क़िताब में रखे हुए गुलाब जैसा मैं इन दिनों सड़ रहा हूँ
तुम्हारे इंतिज़ार की सर्द राहों पर पत्ती पत्ती बिखर रहा हूँ
मैं जीता जागता एक लड़का साँस दर साँस मर रहा हूँ

— ALI ZUHRI

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