"निसा"

दुनिया के रंगीन मज़ाहिरों से हट कर,जब कभी मेरी नज़र उस सादा लिबास लड़की पे अगर पड़ती,
मेरे दिल से हसरतें निकलती और उमंगें झूम उठती,
उस लड़की के नाक-नक़्श बिल्कुल भी बनावटी नहीं
उस के बदन के नुक़ूश में कुछ भी सजावटी नहीं,
ख़ुदा की क़सम दुनिया के मज़ाहिरों में उस के सिवा कुछ भी देखने को नहीं,
उसे इस दुनिया की रंगीनियों की कोई परवाह ही नहीं,
मानो दुनिया से उसे कोई राब्ता ही नहीं,
उसे ख़ुदा ने अपनी क़ुदरत की निशानी के लिए बनाया होगा
उस का पैकर तहतुस्सरा की मिट्टी से तराशा होगा
उस की बुलंदी पे फ़रिश्तों ने भी सर झुकाया होगा
वो तो ऐसी चीज़ है जिसे देख कर ख़ुदा को ख़ुद अपनी कुन पे रश्क आया होगा,
ख़ुदा ने,
कोयल को उस की समा'अत के आशार बख़्शें हैं
और पेड़ों को उस की बाँहों के हार बख़्शें हैं
ये घटा उस की ज़ुल्फ़ों की छाँव में रह कर काली होती है
उस के आँचल से ही शाम पर लाली होती है
उस के हाथों की लकीरों पर दुनिया नक़्श है
जन्नत की हूरों में भी उस का ही अक्स है
उस की आँखों की बीनाई से सुब्ह,रात रौशन है
उस के पहलू में सातों बर्र-ए-आज़मों के मौसम हैं
उस के आरिज़ की पुरनमीं से गुलाब महकते हैं
उस की मुस्कुराहट से जंगल के पंछी चहकते हैं
जुगनू ने उस की ज़ीनत पाई है
मेहँदी ने भी उस के हाथों पे रंगत पाई है
मैं उस लड़की की वज़ाहत अपनी नज़्मों में करुँ भी तो कैसे करुँ
कि मैं ने उसे देखा ही बहुत कम है,
वो रब का अहसान है या तुक़ज़्ज़िबान
इस पे क्या झगड़ना की वो नास है या निसा
वो तो ज़िंदगी को ज़रूरी है जैसे कि निज़ाम-ए-फिज़ा

— ALI ZUHRI

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Jannat Shayari

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