"जंग"
ये जंग कभी न ख़त्म होगी
चल हम दुनिया बसाएँ और कहीं
इस शहर की चिड़ियाँ सहम गई हैं
वो उड़ के जाती हैं और कहीं
यहाँ गूँज रही है तोपों की सदाएँ
चल हम गीत सुनाएँ और कहीं
ये दुनिया है काँटो से भरी
हम फूल खिलाएँ और कहीं
यहाँ नफ़रत का बारूद जला हैं
हम मोहब्बत महकाएँ और कहीं
सब बस्तियाँ जल के राख हुई
चल आशियाँ बनाएँ और कहीं
ये लोग हैं जिस्म चबाने के लिए
हम फसल उगाएँ और कहीं
हर धड़कन में शोर है बरपा
चल सुकून तलाशें और कहीं
— ALI ZUHRI















