"तुम मेरे हो"

आँखों से ओझल कोनो में
दूर सयारों से तारों से
करता हूँ मैं जिस की बातें
वो तुम हो और तुम मेरे हो

हर इक शे'र का मौज़ू तुम हो
हर लेखन है रंग तुम्हारा
हर इक फूल तुम्हीं को चाहे
हर इक डाल का तुम हो साया

इन ग़ज़लों में याद बसर है
इन ग़ज़लों में इश्क़ छुपा है
है इन सब में फ़िक्र तुम्हारी
है इन सब में ज़िक्र तुम्हारा

कौन तुम्हें लेकिन बतलाए
कौन तुम्हें ये सब समझाए
तुम ये कहना दोस्त ही हैं बस
मैं कह दूँगा तुम मेरे हो

— Hasan Raqim

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