"उस के नाम का पत्थर"

इस शहर से दूर एक सहरा है जिस
में एक दरिया
के किनारे पर मैं बैठा राह तकता हूँ तुम्हारी

कब तुम आजाओ किसी पल और देखो
आज कुछ ऐसा हुआ है जिस से सब हैरत में हैं

ये पेड़ की सूखी हुई टेहनी पे बैठे पंछियों में
अफ़रा तफ़री सी मची है

रेत जैसे इन हवाओं की धुनों में झूमती हो
और मुझ से पूछती हो कौन है वो

जिस की यादों में मैं रोज़ाना यहाँ आ कर के
पत्थर फेंकता हूँ?

मैं मगर चुप हूँ तुम्हारी राह तकता हूँ
मन ही मन में मैं ये कहते हुए मुस्कान भरता हूँ

शहर से दूर एक सहरा के बीचो बीच में गर तुम
चले आओ किसी दिन तो तुम्हें भी मैं दिखाऊँगा

वो दरिया जिस में उस के नाम का पत्थर
नहीं डूबा

— Hasan Raqim

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