कैसे मानें कि बात कोई नहीं
आँख पहले तो इतना रोई नहीं
वो जहाँ हैं वहाँ पे सब ही तो हैं
हम जहाँ हैं वहाँ पे कोई नहीं
पूछते क्या हो चाँद तारों से
टूटते दिल की पेशगोई नहीं
रौशनी को हैं लाखों परवाने
हम अँधेरो के पास कोई नहीं
जिस्म भी ऐसा उम्र भर जागा
रूह भी ऐसी तब से सोई नहीं
— Hasan Raqim















