Fakhr Zaman

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Fakhr Zaman shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Fakhr Zaman's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

सर्दी है कि इस जिस्म से फिर भी नहीं जाती सूरज है कि मुद्दत से मिरे सर पर खड़ा है — Fakhr Zaman

Ghazal

जो राज़दार थे पहले वो दुश्मन-ए-जाँ हैं मगर जो दुश्मन-ए-जाँ थे वो राज़दार हुए गुनाह ख़ुद ही किया ख़ुद को फिर सज़ा दे ली हम अपने हाथों कई बार संगसार हुए कभी फ़साना सुना कर भी आँख नम न हुई तुम्हारे ज़िक्र पे ही आज अश्क-बार हुए हर एक चीज़ की इस दौर में सिफ़त बदली पहाड़ शहर बने शहर कोहसार हुए वो पौदे जिन के सरापे बड़े मुलाएम थे हमारे देखते लम्हों में ख़ार-दार हुए गरेबाँ जिन पे भरोसा था हम फ़क़ीरों को जुनूँ की आँच से पल-भर में तार तार हुए बढ़ाएँ उन की तरफ़ दस्त-ए-दोस्ती क्यूँँ-कर जो गुल-सिफ़त थे कभी 'फ़ख़्र' अब वो ख़ार हुए — Fakhr Zaman
वो पहले अंधे कुएँ में गिराए जाते हैं जो संग शीशे के घर में सजाए जाते हैं अजीब रस्म है यारो तुम्हारी महफ़िल में दिए जलाने से पहले बुझाए जाते हैं हमारी सोच ने करवट ये कैसी बदली है हम अपनी आग में ख़ुद को जलाए जाते हैं बड़ा ही ज़ोर है इस बार मेंह के क़तरों में कि पत्थरों पे भी घाव लगाए जाते हैं नए तरीक़ से बरसात अब के आई है कि लोग रेत के घर भी बनाए जाते हैं हमारी राख से उट्ठेगा इक नया इंसाँ इसी ख़याल से ख़ुद को जलाए जाते हैं किसी शजर से कोई साँप गिर के काट न ले हम आज आग सरों पर उठाए जाते हैं जो दीप अपने लहू से जलाए थे हम ने वो एक फूँक से उन को बुझाए जाते हैं हमारा जिस्म है साए में धूप सर पर है बड़े हुनर से वो रौज़न बनाए जाते हैं कुछ ऐसे 'फ़ख़्र' चमन का निज़ाम बदला है बग़ैर आब के पौदे उगाए जाते हैं — Fakhr Zaman
कुछ बात नहीं जिस्म अगर मेरा जला है सद-शुक्र कि उस बज़्म से शो'ला तो उठा है माना कि मिरे लॉन की फिर सब्ज़ हुई घास इस मेंह में पड़ोसी का मकाँ भी तो गिरा है सर्दी है कि इस जिस्म से फिर भी नहीं जाती सूरज है कि मुद्दत से मिरे सर पर खड़ा है हर सम्त ख़मोशी है मगर कहते हैं कुछ लोग इस शहर में इक शोर क़यामत का बपा है दीवार से गो ईंट खिसक कर पड़ी सर पर सद-शुक्र कि रौज़न कोई ज़िंदाँ में खुला है अब देखिए किस राह में दीवार बनेगा ढलवान पे इक संग-ए-गिराँ चल तो पड़ा है इस साल मिरे खेत में ओले भी पड़े हैं इस साल मिरी फ़स्ल को कीड़ा भी लगा है आँखें मिरी रौशन रहें ख़ुश-हाल रहूँ मैं इक अंधी भिकारन की मिरे हक़ में दुआ है मैं भूक से बेहाल हूँ तो सेर-शिकम है क्या मेरा ख़ुदा वो नहीं जो तेरा ख़ुदा है — Fakhr Zaman
हम लोग तो आकास की बेलों में घिरे हैं ख़ुश-बख़्त हैं जो गुलशन-ए-हस्ती में खिले हैं इस धूप की शिद्दत से नहीं कोई मफ़र अब दीवार के साए में बड़े लोग खड़े हैं किस किस को दिखाते रहें जेबों के ये सूराख़ हर मोड़ पर कश्कोल लिए लोग खड़े हैं इक रोज़ हमीं होंगे उजाले के पयम्बर हम लोग कि मुद्दत से अँधेरे में पड़े हैं ये ज़ीस्त कुछ ऐसे है कि उलझे हुए धागे टूटे हुए निकलें जिन्हें समझें कि सिरे हैं हर रोज़ कोई टाँका उधड़ जाता है फिर से हम वक़्त की सोज़न से कई बार सिले हैं जब वक़्त पड़ा देखना दे जाएँगे धोका ये दोस्त नहीं 'फ़ख़्र' सभी कच्चे घड़े हैं — Fakhr Zaman
लम्हों का भँवर चीर के इंसान बना हूँ एहसास हूँ मैं वक़्त के सीने में गड़ा हूँ कहने को तो हर मुल्क में घूमा हूँ फिरा हूँ सोचूँ तो जहाँ था वहीं चुप-चाप खड़ा हूँ फ़ुटपाथ पे अर्से से पड़ा सोच रहा हूँ पत्ता तो मैं सरसब्ज़ था क्यूँँ टूट गिरा हूँ इक रोज़ ज़र-ओ-सीम के अम्बार भी थे हेच बिकने पे जो आया हूँ तो कौड़ी पे बिका हूँ शायद कि कभी मुझ पे भी हीरे का गुमाँ हो देखो तो मैं पत्थर हूँ मगर सोच रहा हूँ हालात का धारा कभी ऐसे भी रुका है नादाँ हूँ कि मैं रेत के बंद बाँध रहा हूँ इक रेत की दीवार की सूरत थे सब आदर्श जिन के लिए इक उम्र मैं दुनिया से लड़ा हूँ अहबाब की नज़रों में हूँ गर वाजिब-ए-ताज़ीम क्यूँँ अपनी निगाहों में बुरी तरह गिरा हूँ ऐ 'फ़ख़्र' गरजना मिरी फ़ितरत सही लेकिन जो ग़ैर की मर्ज़ी से ही बरसे वो घटा हूँ — Fakhr Zaman
तिरी गली सी किसी भी गली की शान नहीं कि इस ज़मीन पे सुनते हैं आसमान नहीं मिज़ा से बढ़ के नहीं है जो कोई तीर-ए-हसीं तुम्हारे अबरू से दिलकश कोई कमान नहीं सिसक रहे हैं जो सड़कों पे सैंकड़ों इंसाँ तुम्हारे शहर में शायद कोई मकान नहीं यहीं बहिश्त है यारो यहीं है दोज़ख़ भी कि इस जहान से आगे कोई जहान नहीं मिरी ख़मोशी का मतलब नहीं क़रार-ओ-सुकूँ भरा है दर्द से दिल ताक़त-ए-बयान नहीं अदू को देते हैं तरजीह मुझ से ख़ादिम पर बुरे-भले के परी-वश मिज़ाज-दान नहीं हमारे शहर में हर एक इस तरह चुप है कि जैसे मुँह में किसी शख़्स के ज़बान नहीं ये अश्क मंज़िल-ए-आख़िर हैं इश्क़ की हमदम कि इन सितारों से आगे कोई निशान नहीं हो 'फ़ख़्र' ख़ाक मुझे क़ौम की तरक़्क़ी पर जो फ़र्द-ए-क़ौम ये मज़दूर और किसान नहीं — Fakhr Zaman

Nazm

ऐ हम-सफ़रो क्यूँँ न यहीं शहर बसा लें अपने ही उसूल अपनी ही अक़दार बना लें वो लोग जिन्हों ने मिरे होंटों को सिया है सोज़न से मिरी सोच का काँटा भी निकालें इस बज़्म से उट्ठेगा न शो'ला कोई हरगिज़ यारो चलो क़िंदील से क़िंदील जला लें हर शहर में हैं फ़स्ल-ए-जुनूँ आने के चर्चे शोरीदा-सरो आओ गरेबान सिला लें यूँँ ज़ेहन पे है ख़ौफ़ के सायों का तसल्लुत हम आई हुई बात को होंटों में दबा लें कहने को तो बाज़ार में हम-जिंस गराँ हैं अमलन हमीं कौड़ी पे ख़रीदार उठा लें बोझ अपना भी हम से तो उठाया नहीं जाता और आप मुसिर आप का भी बोझ उठा लें शायद कोई चिंगारी सुलगती हुई मिल जाए आओ तो ज़रा राख का ये ढेर खंगालें — Fakhr Zaman