सर्दी है कि इस जिस्म से फिर भी नहीं जाती
सूरज है कि मुद्दत से मिरे सर पर खड़ा है
सूरज है कि मुद्दत से मिरे सर पर खड़ा है
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गुज़रे हैं बीस बरस इक दिन
इक ज़ोर की आँधी आई थी
इक ज़ोर की आँधी आई थी
जिस से पेड़ों से जुदा हो कर
लाखों ही पत्ते टूट गिरे
शाह-राहों पर पगडंडियों पर
खेतों में और फ़ुटपाथों पर
कुछ बह गए गंदे नालों में
भंगी की झाड़ू के सदक़े
लेकिन जो बच गए उन को हवा
हर-वक़्त उड़ाए फिरती है
पच्छिम को कभी पूरब को कभी
वो बिखरे पड़े हैं अब हर-सू
और हर-दम पिसते रहते हैं
भारी-भरकम बूटों के तले
Read Fullलाखों ही पत्ते टूट गिरे
शाह-राहों पर पगडंडियों पर
खेतों में और फ़ुटपाथों पर
कुछ बह गए गंदे नालों में
भंगी की झाड़ू के सदक़े
लेकिन जो बच गए उन को हवा
हर-वक़्त उड़ाए फिरती है
पच्छिम को कभी पूरब को कभी
वो बिखरे पड़े हैं अब हर-सू
और हर-दम पिसते रहते हैं
भारी-भरकम बूटों के तले
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ऐ हम-सफ़रो क्यूँ न नया शहर बसा लें
अपने ही उसूल अपनी ही अक़दार बना लें
अपने ही उसूल अपनी ही अक़दार बना लें
जिन लोगों ने अब तक मिरे होंटों को सिया है
सोज़न से मिरी सोच का काँटा भी निकालें
बर्फ़ों पे अलाव नहीं लगते हैं तो यारो
बुझती हुई क़िंदील से क़िंदील जला लें
कहने को तो बाज़ार की हम जिंस-ए-गिराँ हैं
लेकिन हमें कौड़ी पे ख़रीदार उठा लें
बोझ अपना भी हम से तो उठाया नहीं जाता
और आप मुसिर आप का भी बोझ उठा लें
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जो धूप की तपती हुई साँसों से बची सोच
फिर चाँदनी-रातों में बड़ी देर जली सोच
फिर चाँदनी-रातों में बड़ी देर जली सोच
आराम से इक लम्हा भी जीना नहीं मुमकिन
हर वक़्त मिरे ज़ेहन में रहती है नई सोच
इस शहर में आता है नज़र हर कोई अपना
आवाज़ किसे दूँ मुझे रहती है यही सोच
दुख-दर्द का मारा ही कोई समझेगा हम को
हम तक न पहुँच पाएगी नाज़ों की पली सोच
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हो ज़र्द ज़र्द न क्यूँ शम्अ'' की ज़िया यारो
कि उस को अपने पिघलने का जाँ-गुसिल ग़म है
ग़म-ओ-अलम का भी एहसास अब नहीं होता
शुऊर-ओ-फ़िक्र-ओ-नज़र का अजीब आलम है
लहू जलाओ कुछ उस में कि रौशनी तो बढ़े
चराग़-ए-बज़्म सर-ए-शाम ही से मद्धम है
बची है ख़म में जो वो 'फ़ख़्र' है मिरा हिस्सा
कि मेरे जाम ही में दूसरों से मय कम है
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जाएँगे कहाँ सर पे जब आ जाएगा सूरज
वो लोग जो दीवार के साए में खड़े हैं
वो लोग जो दीवार के साए में खड़े हैं
अल्लाह ये लम्हा तो क़यामत की घड़ी है
इंसान से इंसान के साए भी बड़े हैं
हर मोड़ पे हैं सर-ब-फ़लक क़स्र-नुमायाँ
हर मोड़ पे कश्कोल लिए लोग खड़े हैं
इस दर्जा गिरानी है कि पत्थर नहीं मिलते
क़ब्रों पे सलीबें नहीं इंसान गड़े हैं
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लम्हों का भँवर चीर के इंसान बना हूँ
एहसास हूँ मैं वक़्त के सीने में गड़ा हूँ
एहसास हूँ मैं वक़्त के सीने में गड़ा हूँ
कहने को तो हर मुल्क में घूमा हूँ फिरा हूँ
सोचूँ तो जहाँ था वहीं चुप-चाप खड़ा हूँ
फ़ुटपाथ पे अर्से से पड़ा सोच रहा हूँ
पत्ता तो मैं सरसब्ज़ था क्यूँ टूट गिरा हूँ
इक रोज़ ज़र-ओ-सीम के अम्बार भी थे हेच
बिकने पे जो आया हूँ तो कौड़ी पे बिका हूँ
शायद कि कभी मुझ पे भी हीरे का गुमाँ हो
देखो तो मैं पत्थर हूँ मगर सोच रहा हूँ
हालात का धारा कभी ऐसे भी रुका है
नादाँ हूँ कि मैं रेत के बंद बाँध रहा हूँ
इक रेत की दीवार की सूरत थे सब आदर्श
जिन के लिए इक उम्र मैं दुनिया से लड़ा हूँ
अहबाब की नज़रों में हूँ गर वाजिब-ए-ताज़ीम
क्यूँ अपनी निगाहों में बुरी तरह गिरा हूँ
ऐ 'फ़ख़्र' गरजना मिरी फ़ितरत सही लेकिन
जो ग़ैर की मर्ज़ी से ही बरसे वो घटा हूँ
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माना कि मिरे लॉन की फिर सब्ज़ हुई घास
इस मेंह में पड़ोसी का मकाँ भी तो गिरा है
सर्दी है कि इस जिस्म से फिर भी नहीं जाती
सूरज है कि मुद्दत से मिरे सर पर खड़ा है
हर सम्त ख़मोशी है मगर कहते हैं कुछ लोग
इस शहर में इक शोर क़यामत का बपा है
दीवार से गो ईंट खिसक कर पड़ी सर पर
सद-शुक्र कि रौज़न कोई ज़िंदाँ में खुला है
अब देखिए किस राह में दीवार बनेगा
ढलवान पे इक संग-ए-गिराँ चल तो पड़ा है
इस साल मिरे खेत में ओले भी पड़े हैं
इस साल मिरी फ़स्ल को कीड़ा भी लगा है
आँखें मिरी रौशन रहें ख़ुश-हाल रहूँ मैं
इक अंधी भिकारन की मिरे हक़ में दुआ है
मैं भूक से बेहाल हूँ तो सेर-शिकम है
क्या मेरा ख़ुदा वो नहीं जो तेरा ख़ुदा है
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कुछ इस तरह से ख़यालों की रौशनी फैली
तुम्हारी ज़ुल्फ़ भी बिखरी तो तीरगी न हुई
ये बे-हिसी थी रग-ओ-पै में अपने वस्ल की शब
हसीन पास रहे हम से दिल-लगी न हुई
वो तीरगी थी मुसल्लत फ़ज़ा-ए-आलम पर
लहू के दीप जले फिर भी रौशनी न हुई
किसी के दर्द को मैं जानता भला क्यूँ कर
ख़ुद अपने दर्द से जब मुझ को आगही न हुई
पुकारें 'फ़ख़्र' किसे दाम-ओ-दद किसे इंसाँ
जहाँ में हम को तो इतनी तमीज़ भी न हुई
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