किसी की याद है और हसरतों का मातम है

बहुत दिनों से लगातार आँख पुर-नम है

हो ज़र्द ज़र्द न क्यूँ शम्अ' की ज़िया यारो
कि उस को अपने पिघलने का जाँ-गुसिल ग़म है

ग़म-ओ-अलम का भी एहसास अब नहीं होता
शुऊर-ओ-फ़िक्र-ओ-नज़र का अजीब आलम है

लहू जलाओ कुछ उस में कि रौशनी तो बढ़े
चराग़-ए-बज़्म सर-ए-शाम ही से मद्धम है

बची है ख़म में जो वो 'फ़ख़्र' है मिरा हिस्सा
कि मेरे जाम ही में दूसरों से मय कम है

— Fakhr Zaman

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