जो ख़ुद में झाँक के देखा हज़ार शर निकले

जिन्हें समझता था मंज़िल महज़ सफ़र निकले

कटे दरख़्त कई आशियाँ गिरे कितने
न जाने कितने परिंदों के ऐसे पर निकले

वो जिस ज़िया को सभी शहर-ए-रौशनी समझे
उस एक आग में झुलसे तमाम घर निकले

मैं उस के दर से गुज़रते हुए रुका कुछ पल
उमीद ले के कि शायद वो देख कर निकले

— Hasan Raqim

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