KHaak dil ko bhi ghar kare kyunkar | ख़ाक दिल को भी घर करे क्यूँँकर

  - Hasan Raqim

ख़ाक दिल को भी घर करे क्यूँँकर
कोई आ कर यहाँ मरे क्यूँँकर

दिल ख़ुशी से दिया था हम ने उसे
फिर ग़मो से ये दिल भरे क्यूँँकर

हम उसे याद किस तरह आएं
वो हमें याद भी करे क्यूँँकर

उसके हाथों ने छू लिया आख़िर
ज़ख़्म रहते ये फिर हरे क्यूँँकर

मौत हक़ है तो मुश्किलें कैसी
मौत से आदमी डरे क्यूँँकर

और भी तो हैं हुस्न वाले यहाँ
दिल उसी पर ही जा मरे क्यूँँकर

  - Hasan Raqim

Husn Shayari

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