जो लोग वक़्त के चलते यहाँ बदलते नहीं

वो गिर के उठते है लेकिन कभी सँभलते नहीं

मैं एक तरफ़ा मुहब्बत की क्या मिसालें दूँ
ये लोग आग पे चलते हैं और जलते नहीं

ये अहल-ए-इल्म मुसीबत को टालते हैं यूँ
कि घर से माँ की दुआ के बग़ैर चलते नहीं

तू ज़िंदगी में मेरी आ के रौशनी कर दे
कि मुझ से तन्हा उमीदों के दीप जलते नहीं

तमाम कोशिशें की हैं इन्हें मनाने की
ये पत्थरों से बने दिल मगर पिघलते नहीं

— Hasan Raqim

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Ibaadat Shayari

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