Shaad Imran

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@shaad-imran

Shaad Imran shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shaad Imran's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

अपना मिलना है, ख़ास लोगों से या'नी की बस उदास लोगों से — Shaad Imran
तुम ने बस बाज़ार में जलवे देखे हैं हम ने भीड़ में खोते बच्चे देखे हैं — Shaad Imran
उस लड़की के जाने से बस ये बदला प्यारी-प्यारी ग़ज़लें होना छूट गई — Shaad Imran
ऐसा नहीं कि मैं ने मोहब्बत नहीं करी इज़हार करने ही कि बस हिम्मत नहीं करी — Shaad Imran
आजकल हम जफ़ा पे लिखते हैं या'नी तेरी अदा पे‌ लिखते हैं — Shaad Imran
मेरे हाथों में अपना हाथ रख कर कहा उस ने कभी ये हाथ तो न छोड़ोगे — Shaad Imran
उस के इश्क़ में बाल बढ़ाने वालों सुन लो उस के घर वाले तो पैसा देखेंगे — Shaad Imran
मैं अपने आप से तंग आ चुका हूँ कहीं मरवा न दूँ ख़ुद को किसी से — Shaad Imran
उस लड़की के जाने से बस ये बदला प्यारी-प्यारी ग़ज़लें होना छूट गई — Shaad Imran
कुछ चीज़ें तन्हा अच्छी हैं जैसे चाँद, ख़ुदा और मैं — Shaad Imran
अब्र जब भी गुज़रते हैं गली से रंग चुरा लेते है तेरी ओढ़नी से — Shaad Imran
कभी कभी भली आदत भी मार देती है हमारे जैसों को चाहत भी मार देती है — Shaad Imran
एक तुम सेे ही हम हँस के मिला करते हैं सब के आगे थोड़ी हम ऐसा किया करते हैं — Shaad Imran

Ghazal

इक तेरी ख़ामुशी से डरता हूँ वरना मैं कब किसी से डरता हूँ पंखा आवाज़ देने लगता है जब भी मैं ज़िन्दगी से डरता हूँ अब तो बर्बाद कर लिया ख़ुद को अब नहीं शा'इरी से डरता हूँ था जो फ़रहाद, मेरा अपना था इस लिए आशिक़ी से डरता हूँ वो किसी और को न हाँ कह दे उस की सादा-दिली से डरता हूँ बाग़ से फूल तोड़ लूँ लेकिन तितलियों की कमी से डरता हूँ काट डाले न शाह हाथ मेरे अपनी कारीगरी से डरता हूँ तू ने छोड़ा तो बन गया क़ाबिल अब तेरी वापसी से डरता हूँ जानता हूँ तुम्हारे बाप को भी मैं मगर एक ही से डरता हूँ सुन के हैरत हुई कि मुझ से ख़ुदा कहता है आदमी से डरता हूँ — Shaad Imran
हमारी ज़िंदगी में क्या नया है वही होता है जो, वो हो रहा है मैं अक्सर बैठे-बैठे सोचता हूँ सज़ा-ए-मौत क्या सच-मुच सज़ा है? ज़रा दुनिया का अपनी हाल देखो ज़रा सोचो कोई सच-मुच ख़ुदा है? बड़ा तो पैदा होने का ही दुख है धरम तो छोटा मोटा मसअला है किसी के वास्ते पत्थर तिरे हैं किसी के साथ में मूसा चला है सुकूँ दरकार है जिस शख़्स को भी यक़ीं मानो सुसाइड रास्ता है मैं ज़िम्मेदारियों में फँस गया हूँ मुझे मरने का मौक़ा कब मिला है? तुम्हारी आँख में काजल नहीं है तुम्हारी आँख में ख़ंजर लगा है न अपनी शा'इरी है 'जौन' जैसी न अपना इश्क़ कोई 'फारिहा' है मैं जिस के वास्ते ग़ज़लें लिखूँ हूँ वो मेरा नाम तक नईं जानता है — Shaad Imran