लाख विनती करो ज़माने से
बाज़ आता नहीं सताने से
बिन कहे होंठ चूम लेता है
जब कभी काम हो दिवाने से
लड़कियों से ये पूछना था मुझे
हुस्न बढ़ता है भाव खाने से?
हम तो जलते हैं उन फ़रिश्तों से
चिपके रहते जो तेरे शाने से
काम बनते हुए कई देखे
एक लड़की के मुस्कुराने से
हम भी देखेंगे, कौन रोकेगा
फ़ैज़ अहमद की नज़्म गाने से
कितना दुश्वार हो गया जीना
बाग़ का एक सेब खाने से
ख़ुदकुशी भी तो रब की मर्ज़ी है
मुझको बुलवा लिया बहाने से
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