एक ही धोका तो दो बार नहीं खाऊँगा
खा तो सकता हूँ मगर यार नहीं खाऊँगा
इश्क़ दोनों ने किया दोनों को पत्थर मारो
मैं अकेला तो मियाँ मार नहीं खाऊँगा
काम का दुख हूँ मैं सो ऐ मेरे दफ़्तर वाले
कैसे कह दूँ तेरा इतवार नहीं खाऊँगा
जुर्म मेरा भी वही है कि मैं सच बोलता हूँ
ज़हर लेकिन मेरे सरकार नहीं खाऊँगा
— Shaad Imran















