आजकल हम जफ़ा पे लिखते हैंया'नी तेरी अदा पे लिखते हैंदिल कभी दीवार और कभी-कभी तोहम तिरा नाम हवा पे लिखते हैंज़िन्दगी खेल नहीं पतंगों काचलो ये आसमाँ पे लिखते हैंआज फिर याद घर की आई हैआज फिर कुछ माँ पे लिखते हैं'शाद' क्या दौर आया शा'इरी कालोग सिर्फ़ बे-वफ़ा पे लिखते हैं— Shaad Imran