ik teri khaamoshi se dartaa hooñ | इक तेरी ख़ामुशी से डरता हूँ

  - Shaad Imran

इक तेरी ख़ामुशी से डरता हूँ
वरना मैं कब किसी से डरता हूँ

पंखा आवाज़ देने लगता है
जब भी मैं ज़िन्दगी से डरता हूँ

अब तो बर्बाद कर लिया ख़ुद को
अब नहीं शायरी से डरता हूँ

था जो फ़रहाद, मेरा अपना था
इसलिए आशिक़ी से डरता हूँ

वो किसी और को न हाँ कह दे
उसकी सादा-दिली से डरता हूँ

बाग़ से फूल तोड़ लूँ लेकिन
तितलियों की कमी से डरता हूँ

काट डाले न शाह हाथ मेरे
अपनी कारीगरी से डरता हूँ

तूने छोड़ा तो बन गया क़ाबिल
अब तेरी वापसी से डरता हूँ

जानता हूँ तुम्हारे बाप को भी
मैं मगर एक ही से डरता हूँ

सुन के हैरत हुई कि मुझ से ख़ुदा
कहता है आदमी से डरता हूँ

  - Shaad Imran

Basant Shayari

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