rauzan-e-ham nazar pe dastak de | रौज़न-ए-हम नज़र पे दस्तक दे

  - Hasan Raqim

रौज़न-ए-हम नज़र पे दस्तक दे
ख़्वाहिशातों के दर पे दस्तक दे

तन्हा शा
में ये सोचते गुज़रीं
कोई तो आए घर पे दस्तक दे

कब तक उसकी गली से गुज़रेगा
जा कभी उसके दर पे दस्तक दे

काम-काजों से घिर चुका कोई
कैसे अपने हुनर पे दस्तक दे

उसका होना है इस सेे पहले की,
मौत आकर के दर पे दस्तक दे

  - Hasan Raqim

Nigaah Shayari

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