subh-e-magroor ko vo shaam bhi kar deta hai | सुब्ह-ए-मग़रूर को वो शाम भी कर देता है

  - Nadeem Farrukh

सुब्ह-ए-मग़रूर को वो शाम भी कर देता है
शोहरतें छीन के गुमनाम भी कर देता है

वक़्त से आँख मिलाने की हिमाकत न करो
वक़्त इंसान को नीलाम भी कर देता है

  - Nadeem Farrukh

Aadmi Shayari

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    बहुत से खेत प्यासे रह गए हैं

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    कौन देगा मिरी ख़बर मुझ को

    मर्तबा चाहता हूँ कुछ मैं भी
    ऐ मोहब्बत तबाह कर मुझ को

    जो मुझे एक दिन में भूल गया
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    अपने अंदर तलाश कर मुझ को
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