वो मेरी पहचान भी हो सकती थी ना
हर मुश्किल आसान भी हो सकती थी ना
तुम ने वो ख़त राख किया ये नइं सोचा
उस
में मेरी जान भी हो सकती थी ना
वो जिस ने ये ज़ख़्म दिए हैं मुझ को वो,
ज़ख़्मों का दरमान भी हो सकती थी ना
दुनिया से ये अश्क छुपा पाता फिर मैं,
वो मेरा दामान भी हो सकती थी ना
ये वादों की बात जो तुम अब करते हो,
हिजरत के दौरान भी हो सकती थी ना
— Hasan Raqim















