"सूखा हुआ दरख़्त और मैं"
और फिर ये सूखा हुआ दरख़्त मानों आज हमारे हिज्र से उदास हो
इस की टहनियाँ दो दिलों के अलग होने पे सूख रहीं हैं
जिस तरह कोई सब्ज़ बाग़ भी बारिश से जुदा होने पर सहरा हो जाता है
तुम्हें वो दरख़्त याद है नवही दरख़्त जिस के नीचे हम ने कभी जुदा न होने के अहद लिए थे
मैं आज भी उस दरख़्त के नीचे बैठा तुम्हारा इंतिज़ार देखता हूँ
इस उमीद में की शायद किसी दिन
तमाम यादों के साथ तुम भी लौट आओगे और हम इक दफ़ा फिर मिल सकेंगे
कितने नादान थे हम की सोचते थे वक़्त ओ हालात हमारे हाथ में हैं
मगर आज उसी दरख़्त के नीचे अकेला हूँ तो सोचता हूँ
की इंसान तो महज़ हालातों की क़ैद में जकड़ा हुआ है
ये सच है की तुम्हारा लौट आना मुमकिन नहीं है
मगर दिल है की मानने से कतरा रहा है
ये कैसी मुश्किल में तुम मुझ को डाल गए हो
तुम्हारे बग़ैर न दिन कट रहें हैं न रातें, न तुम हो न तुम्हारा अक्स
अगर कुछ है तो हिज्र, तन्हाई, और ग़म
वही ग़म जिस से, तुम मेरी सलामती की दुआ किया करती थीं















