to kya gar vo dilon men faaslon ko chhod jaate hain | तो क्या गर वो दिलों में फ़ासलों को छोड़ जाते हैं

  - Hasan Raqim

तो क्या गर वो दिलों में फ़ासलों को छोड़ जाते हैं
सभी गाहक ही टूटे आइनों को छोड़ जाते हैं

हमारे कहने पे तो जंग का क़तरा नहीं रुकता
तुम्हारे कहने पे दुश्मन सफ़ों को छोड़ जाते हैं

मुझे पतझड़ के मौसम ने सिखाया हिज्र का मतलब
कि कैसे सूखे पत्ते टहनियों को छोड़ जाते हैं

नये शहरों में बच्चों के लिए घर लेते हैं माँ बाप
वही बच्चे बड़े होकर घरों को छोड़ जाते हैं

खिलौने पाने की नाकाम हसरत से भरे बच्चे
चले जाते हैं मेलों से दिलों को छोड़ जाते हैं

पुरानी यादों के बाग़ीचे को जब याद करते हैं
वो काँटे बीन लेते हैं गुलों को छोड़ जाते हैं

जहाँ कुछ भी नहीं बचता वहाँ ढूँढा करो मुझको
घरों को तोड़ते तूफ़ाँ दियों को छोड़ जाते हैं

  - Hasan Raqim

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