“अलार्म”
धूप कुछ मिली ही थी
फूल कुछ खिले ही थे
दूरियाँ हटी ही थीं
और हम मिले ही थे
फिर ख़याल माज़ी के
एक अलार्म की तरहा
नींद से जगा बैठे
ख़्वाब इक मिटा बैठे
फासले बढ़ा बैठे
— Hasan Raqim
धूप कुछ मिली ही थी
फूल कुछ खिले ही थे
दूरियाँ हटी ही थीं
और हम मिले ही थे
फिर ख़याल माज़ी के
एक अलार्म की तरहा
नींद से जगा बैठे
ख़्वाब इक मिटा बैठे
फासले बढ़ा बैठे
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