"मुलाक़ात"
बहुत दिन हो गए मिल के
इक अर्से बा'द आए हो
ज़माना कैसे गुज़रा है
कोई हमराज़ अपना है
तुम्हारे दिल में अब तक तो
कली इक खिल गई होगी
कोई तो मिल गई होगी
हाँ बिल्कुल मिल गई है ना
बहुत ही ख़ूब-सूरत सी
तुम्हारे जैसी इक लड़की
बहुत ही नर्म लहजा है
कभी ख़ुद कुछ नहीं कहती
हमेशा मेरी सुनती है
ये दिन जब ढलने लगता है
मुझे जब नींद आती है
वो बन के ख़्वाब सा कोई
मेरी आँखों में आती है
है इक लड़की तुम्हीं जैसी
मेरी नींदें चुराती है
भला अब झूठ क्या बोलूँ
मेरे जीवन की वो लड़की
हक़ीक़त में तो तुम ही हो
मेरी यादों में रहते हो
— Hasan Raqim















