
मेरी आँखों में बनकर ख़्वाब मुझ को आज़माती हैं
तेरी यादें अभी तक रातों की नींदें उड़ाती हैं
वो जिन अलमारियों में मैं तुम्हारी यादें रखता था
उन्हीं अलमारियों में अब किताबें धूल खाती हैं
— Hasan Raqim
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