अगर दिये सा भी कम होता ज़िंदगी का वक़्त
गुज़ार देता तेरे साथ में वो सारा वक़्त
वो बात करती थी जब उसको वक़्त मिलता था,
मैं बात करने की ख़ातिर निकालता था वक़्त
उसे ख़बर भी नहीं थी मगर ये ग़म था मुझे,
उसे हँसाता था मुझ को रुलाने वाला वक़्त
किसी दिये सा ही रोशन हुआ था वक़्त अपना
किसी दिये की तरह ही ये जा बुझेगा वक़्त
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