अगर दिए सा भी कम होता ज़िंदगी का वक़्त
गुज़ार देता तेरे साथ में वो सारा वक़्त
वो बात करती थी जब उस को वक़्त मिलता था,
मैं बात करने की ख़ातिर निकालता था वक़्त
उसे ख़बर भी नहीं थी मगर ये ग़म था मुझे,
उसे हँसाता था मुझ को रुलाने वाला वक़्त
किसी दिए सा ही रौशन हुआ था वक़्त अपना
किसी दिए की तरह ही ये जा बुझेगा वक़्त
— Hasan Raqim















