Iftikhar Raghib

Iftikhar Raghib

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Iftikhar Raghib shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Iftikhar Raghib's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

दिन में आने लगे हैं ख़्वाब मुझे उस ने भेजा है इक गुलाब मुझे — Iftikhar Raghib

Ghazal

वो कहते हैं कि आँखों में मिरी तस्वीर किस की है मैं कहता हूँ कि रौशन इस क़दर तक़दीर किस की है वो कहते हैं कि किस ने आप को रोका है जाने से मैं कहता हूँ कि मेरे पाँव में ज़ंजीर किस की है वो कहते हैं कि है इंसान तो इक ख़ाक का पुतला मैं कहता हूँ कि इतनी अज़्मत-ओ-तौक़ीर किस की है वो कहते हैं कि दिल में आप ने किस को बसाया है मैं कहता हूँ कि ये दुनिया-ए-दिल जागीर किस की है वो कहते हैं कि किस ने जा-ब-जा लिख्खा है मेरा नाम मैं कहता हूँ शिकस्ता इस क़दर तहरीर किस की है वो कहते हैं कि मैं ने आप सा सा में नहीं देखा मैं कहता हूँ कि इतनी पुर-कशिश तक़रीर किस की है वो कहते हैं तिरे शे'रों में है शोख़ी क़यामत की मैं कहता हूँ ख़याल ओ फ़िक्र में तनवीर किस की है वो कहते हैं कि हम हैं दुश्मनान-ए-अम्न के दुश्मन मैं कहता हूँ कि उन के हाथ में शमशीर किस की है वो कहते हैं कि 'राग़िब' तुम नहीं रखते ख़याल अपना मैं कहता हूँ कि हर दम फ़िक्र दामन-गीर किस की है — Iftikhar Raghib
ख़िरद-गज़ीदा जुनूँ का शिकार या'नी मैं मिला था ग़म को भी इक ग़म-गुसार या'नी मैं मोहब्बतें न लुटाता तो और क्या करता वुफ़ूर-ए-शौक़ का आईना-दार या'नी मैं अज़ीम चाक पे थी इंकिसार की मिट्टी बना था कूज़ा कोई शाहकार या'नी मैं चमक रहा था मुआफ़िक़ तिरी तवज्जोह के ख़ुलूस-ओ-मेहर-ओ-वफ़ा का दयार या'नी मैं मिरे ख़ुदा नहीं थमता ये ज़ुल्म का तूफ़ान और उस के सामने मुश्त-ए-ग़ुबार या'नी मैं हुई थी जब भी तिरे इल्तिफ़ात की बारिश लहक उठा था तरह लाला-ज़ार या'नी मैं ज़हे-नसीब हवादिस में भी नहीं टूटा तिरा ग़ुरूर तिरा इफ़्तिख़ार या'नी मैं है मुस्तक़िल मिरे सीने में दर्द या'नी तू न रह सका तिरे दिल में क़रार या'नी मैं हर एक बात मिरी कर रहा था रद 'राग़िब' मिरे सुख़न पे था कोई सवार या'नी मैं — Iftikhar Raghib
याद दिलाओ मत उन को वो रात और दिन चैन उन्हें अब आ जाता है मेरे बिन मछली कैसे रहती है पानी के बिन हाल से मेरे ख़ूब हैं वो वाक़िफ़ लेकिन लर्ज़ीदा लब पर था भुला तो न दोगे हमें नम-दीदा आँखों ने कहा था ना-मुम्किन दिल के दो हर्फ़ों जैसे ही एक हैं हम इक मुतहर्रिक हर लम्हा और इक साकिन चेहरे से ज़ाहिर है दिल की कैफ़िय्यत कितना छुपाएगा कोई अक्स-ए-बातिन किस किस की बातों में दिल आ जाता है किस को पता है कब आएँगे अच्छे दिन मातम-पुर्सी मत कर ऐ मुँह-ज़ोर हवा कितने पत्ते टूटे अब तादाद न गिन एहसानात लुटाए जाते हैं 'राग़िब' सब्ज़ दरख़्तों जैसे हैं मेरे मोहसिन — Iftikhar Raghib
ज़ेहन-ओ-दिल में है जंग या कुछ और हो रहा हूँ मलंग या कुछ और हाल क्या हो गया समाअ'त का तेरी बातें थीं संग या कुछ और कोई उतरा है झील में दिल की उठ रही है तरंग या कुछ और तेरे हाथों में डोर है या दिल हो गया हूँ पतंग या कुछ और कोशिशें राएगाँ मनाने की मुझ को ही था न ढंग या कुछ और मुश्किलें रोज़ बढ़ती जाती हैं वो सितमगर है तंग या कुछ और दिल में है आस आरज़ू वहशत बे-क़रारी उमंग या कुछ और हौसले मेरे मिस्ल कोह हुए तेरी चाहत है संग या कुछ और मेरे शे'रों पे हो गए साकित यार मेरे हैं दंग या कुछ और उन के हाथों में आज-कल 'राग़िब' है रिफ़ाक़त का रंग या कुछ और — Iftikhar Raghib
क्या इश्क़ है जब हो जाएगा तब बात समझ में आएगी जब ज़ेहन को दिल समझाएगा तब बात समझ में आएगी पल में ख़ुश पल में रंजीदा आए न समझ में बात है क्या दिल खिल खिल कर मुरझाएगा तब बात समझ में आएगी गुम-सुम रहने का क्या है सबब हँसता है अकेले में कोई कब जब कोई दिल को चुराएगा तब बात समझ में आएगी मैं औरों को समझाता था ऐ इश्क़ मुझे मालूम न था जब कुछ न समझ में आएगा तब बात समझ में आएगी क्या आफ़त दिल का आना है बे-सूद अभी समझाना है दिल तड़पेगा तड़पाएगा तब बात समझ में आएगी छुप-छुप कर दिल क्यूँ रोता है क्या आलम-ए-वहशत होता है रह-रह कर जी घबराएगा तब बात समझ में आएगी क्या शय है मोहब्बत की ख़ुशबू आता है नज़र कोई क्यूँ हर सू आँखों में कोई बस जाएगा तब बात समझ में आएगी 'राग़िब' मत पूछ है रग़बत क्या इज़हार मोहब्बत क्या है बला इक लफ़्ज़ न मुँह तक आएगा तब बात समझ में आएगी — Iftikhar Raghib
चाहतों का सिलसिला है मुस्तक़िल सब्ज़ मौसम कर्ब का है मुस्तक़िल क्या बताऊँ दिल में किस की याद का एक काँटा चुभ रहा है मुस्तक़िल बढ़ रहा है मुस्तक़िल क़हत-ए-शजर ज़हर-आलूदा फ़ज़ा है मुस्तक़िल राह-ए-उल्फ़त में कहाँ आसानियाँ पुर-ख़तर ये रास्ता है मुस्तक़िल आ गई है फ़स्ल-ए-आज़ादी मगर ख़ौफ़ का पौदा हरा है मुस्तक़िल दुश्मनी के सब दरीचे बंद हैं दोस्ती का दर खुला है मुस्तक़िल इश्क़ के इक टिमटिमाते दीप ने दिल को रौशन कर रखा है मुस्तक़िल एक मौसम की कसक है दिल में दफ़्न मीठा मीठा दर्द सा है मुस्तक़िल ज़ेहन ओ दिल की वादी-ए-पुर-अम्न में गूँजती किस की सदा है मुस्तक़िल देख कर रस्म-ए-वफ़ा इस दौर की शर्मगीं हर्फ़-ए-वफ़ा है मुस्तक़िल ग़म किसी का हो गया 'राग़िब' नसीब वर्ना इस दुनिया में क्या है मुस्तक़िल — Iftikhar Raghib
अच्छे दिनों की आस लगा कर मैं ने ख़ुद को रोका है कैसे कैसे ख़्वाब दिखा कर मैं ने ख़ुद को रोका है मैं ने ख़ुद को रोका है जज़्बात की रौ में बहने से दिल में सौ अरमान दबा कर मैं ने ख़ुद को रोका है फ़ुर्क़त के मौसम में कैसे ज़िंदा हूँ तुम क्या जानो कैसे इस दिल को समझा कर मैं ने ख़ुद को रोका है छोड़ के सब कुछ तुम से मिलने आ जाना दुश्वार नहीं मुस्तक़बिल का ख़ौफ़ दिला कर मैं ने ख़ुद को रोका है कटते कहाँ हैं हिज्र के लम्हे फिर भी एक ज़माने से तेरी यादों से बहला कर मैं ने ख़ुद को रोका है वापस जाने के सब रस्ते मैं ने ख़ुद मसदूद किए कश्ती और पतवार जला कर मैं ने ख़ुद को रोका है जब भी मैं ने चाहा 'राग़िब' दुश्मन पर यलग़ार करूँँ ख़ुद को अपने सामने पा कर मैं ने ख़ुद को रोका है — Iftikhar Raghib
तर्क-ए-तअल्लुक़ात नहीं चाहता था मैं ग़म से तिरे नजात नहीं चाहता था मैं कब चाहता था तेरी इनायत की बारिशें शादाबी-ए-हयात नहीं चाहता था में मुझ से तू ऐ बहिश्त-ए-नज़र यूँँ नज़र न फेर क्या तुझ को ता-हयात नहीं चाहता था मैं मैं चाहता था तुम से न जीतूँ कभी मगर खा जाऊँ ख़ुद से मात नहीं चाहता था मैं गुज़री है दिल पे कैसी क़यामत मैं क्या कहूँ नफ़रत की काएनात नहीं चाहता था मैं क्या हाल अब है तेरे तआक़ुब में ऐ हयात तू यूँँ ही आए हात नहीं चाहता था मैं मैं चाहता था राह में कुछ मुश्किलें मगर हर हर क़दम पे घात नहीं चाहता था मैं 'राग़िब' वो मेरी फ़िक्र में ख़ुद को भी भूल जाएँ ऐसी तो कोई बात नहीं चाहता था मैं — Iftikhar Raghib