muztarib aap ke bina hai jee | मुज़्तरिब आप के बिना है जी

  - Iftikhar Raghib

मुज़्तरिब आप के बिना है जी
ये मोहब्बत भी क्या बला है जी

जी रहा हूँ मैं कितना घुट घुट कर
ये मिरा जी ही जानता है जी

मेरे सीने में जो धड़कता है
मेरा दिल है कि आप का है जी

आप इस को बुरा समझते हैं
अपना अपना मुशाहिदा है जी

इतने मासूम आप मत बनिए
आप लोगों को सब पता है जी

क्या बताऊँ कि कितनी शिद्दत से
तुम से मिलने को चाहता है जी

चंद यादें हैं चंद सपने हैं
अपने हिस्से में और क्या है जी

अहल-ए-फ़ुर्क़त की ज़िंदगी 'राग़िब'
ज़िंदगी है कि इक सज़ा है जी

  - Iftikhar Raghib

Mohabbat Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Iftikhar Raghib

As you were reading Shayari by Iftikhar Raghib

Similar Writers

our suggestion based on Iftikhar Raghib

Similar Moods

As you were reading Mohabbat Shayari Shayari