ख़िरद-गज़ीदा जुनूँ का शिकार या'नी मैं

मिला था ग़म को भी इक ग़म-गुसार या'नी मैं

मोहब्बतें न लुटाता तो और क्या करता
वुफ़ूर-ए-शौक़ का आईना-दार या'नी मैं

अज़ीम चाक पे थी इंकिसार की मिट्टी
बना था कूज़ा कोई शाहकार या'नी मैं

चमक रहा था मुआफ़िक़ तिरी तवज्जोह के
ख़ुलूस-ओ-मेहर-ओ-वफ़ा का दयार या'नी मैं

मिरे ख़ुदा नहीं थमता ये ज़ुल्म का तूफ़ान
और उस के सामने मुश्त-ए-ग़ुबार या'नी मैं

हुई थी जब भी तिरे इल्तिफ़ात की बारिश
लहक उठा था तरह लाला-ज़ार या'नी मैं

ज़हे-नसीब हवादिस में भी नहीं टूटा
तिरा ग़ुरूर तिरा इफ़्तिख़ार या'नी मैं

है मुस्तक़िल मिरे सीने में दर्द या'नी तू
न रह सका तिरे दिल में क़रार या'नी मैं

हर एक बात मिरी कर रहा था रद 'राग़िब'
मिरे सुख़न पे था कोई सवार या'नी मैं

— Iftikhar Raghib

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