ik tera hijr daaimi hai mujhe | इक तेरा हिज्र दाइमी है मुझे

  - Tehzeeb Hafi

इक तेरा हिज्र दाइमी है मुझे
वर्ना हर चीज़ आरज़ी है मुझे

  - Tehzeeb Hafi

Hijr Shayari

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    कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ
    फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते
    Ahmad Faraz
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    हिज्र की रातें इतनी भारी होती हैं
    जैसे छाती पर ऐरावत बैठा हो
    Tanoj Dadhich
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    उससे तो मैं बिछड़ गया अब देख ऐ 'पवन'
    कब दुनिया आए रास यही सोचता रहा
    Pawan Kumar
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    Siraj Faisal Khan
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    ये रोने-धोने का नाटक तवील मत कर अब
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    Ashutosh Vdyarthi
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    हिज्र में इश्क़ यूँ रखा आबाद
    हिचकियांँ तन्हा तन्हा लेते रहे
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    रेल की सीटी में कैसे हिज्र की तम्हीद थी
    उसको रुख़्सत करके घर लौटे तो अंदाज़ा हुआ
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    वो एक शख़्स जो दिखने में ठीक-ठाक सा था
    बिछड़ रहा था तो लगने लगा हसीन बहुत
    Siraj Faisal Khan
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    नाम पे हम क़ुर्बान थे उस के लेकिन फिर ये तौर हुआ
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    मुझ से बिछड़ कर भी वो लड़की कितनी ख़ुश ख़ुश रहती है
    उस लड़की ने मुझ से बिछड़ कर मर जाने की ठानी थी
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    Jaun Elia
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    कोई समंदर, कोई नदी होती कोई दरिया होता
    हम जितने प्यासे थे हमारा एक गिलास से क्या होता

    ताने देने से और हम पे शक करने से बेहतर था
    गले लगा के तुमने हिजरत का दुख बाट लिया होता
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    Tehzeeb Hafi
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More by Tehzeeb Hafi

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    एक और शख़्स छोड़कर चला गया तो क्या हुआ
    हमारे साथ कौन सा ये पहली मर्तबा हुआ।

    अज़ल से इन हथेलियों में हिज्र की लकीर थी
    तुम्हारा दुःख तो जैसे मेरे हाथ में बड़ा हुआ

    मेरे खिलाफ दुश्मनों की सफ़ में है वो और मैं
    बहुत बुरा लगूँगा उस पर तीर खींचता हुआ
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    Tehzeeb Hafi
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    गले तो लगना है उससे कहो अभी लग जाए
    यही न हो मेरा उसके बग़ैर जी लग जाए

    मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं
    तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए

    अगर कोई तेरी रफ़्तार मापने निकले
    दिमाग़ क्या है जहानों की रौशनी लग जाए

    तू हाथ उठा नहीं सकता तो मेरा हाथ पकड़
    तुझे दुआ नहीं लगती तो शायरी लग जाए

    पता करूँगा अँधेरे में किस से मिलता है
    और इस अमल में मुझे चाहे आग भी लग जाए

    हमारे हाथ ही जलते रहेंगे सिगरेट से?
    कभी तुम्हारे भी कपड़ों पे इस्त्री लग जाए

    हर एक बात का मतलब निकालने वालों
    तुम्हारे नाम के आगे न मतलबी लग जाए

    क्लासरूम हो या हश्र कैसे मुमकिन है
    हमारे होते तेरी ग़ैर-हाज़िरी लग जाए

    मैं पिछले बीस बरस से तेरी गिरफ़्त में हूँ
    के इतने देर में तो कोई आई. जी. लग जाए
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    Tehzeeb Hafi
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    आँख की खिड़कियाँ खुली होंगी
    दिल में जब चोरीयाँ हुई होंगी

    या कहीं आइने गिरे होंगे
    या कहीं लड़कियाँ हँसी होंगी

    या कहीं दिन निकल रहा होगा
    या कहीं बस्तियाँ जली होंगी

    या कहीं हाथ हथकड़ी में क़ैद
    या कहीं चूड़ियाँ पड़ी होंगी

    या कहीं ख़ामशी की तक़रीबात
    या कहीं घंटियाँ बजी होंगी

    लौट आयेंगे शहर से भाई
    हाथ में राखियाँ बँधी होंगी

    उन दिनों कोई मर गया होगा
    जिन दिनों शादियाँ हुई होंगी
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    Tehzeeb Hafi
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    तुझे भी खौफ था तेरी मुखालफत करूँगा मै
    और अब नहीं करूँगा तो गलत करूँगा मै

    उसे कहो के अहद-ए-तर्क-ए-रस्मो-राह लिख के दे
    कलाई काट के लहू से दशतख्त करूँगा मै

    मेरे लबों ने उस ज़मीं को दाग दार कर दिया
    गलत नहीं भी हूँ तो उससे माजरत करूँगा मै

    तुझे भी खौफ था तेरी मुखालफत करूँगा मैं
    और अब अगर नही करूंगा तो गलत करुँगा मैं
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    Tehzeeb Hafi
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    उसके चाहने वालों का आज उसकी गली में धरना है
    यहीं पे रुक जाओ तो ठीक है आगे जाके मरना है

    रूह किसी को सौंप आये हो तो ये जिस्म भी ले जाओ
    वैसे भी मैंने इस खाली बोतल का क्या करना है

    आँख से आँसू दिल से दर्द उमड़ आने पर हैरत क्या
    मुझे पता था उसने हर बर्तन का नूतन भरना है
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    Tehzeeb Hafi
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