आग के साथ ही पानी भी बहम रखना था
दिल में था 'इश्क़ तो आँखों को भी नम रखना था
मुझ को मालूम था बदली हुई रुत का अंजाम
फिर भी बे-ताब उमंगों का भरम रखना था
अब कहाँ दिल की तलब अक़्ल से हो कुछ इमदाद
इक ज़रा सोच के पहला ही क़दम रखना था
उन से उम्मीद न रखता मैं वफ़ा की कैसे
दस्त-ए-उल्फ़त में मोहब्बत का इल्म रखना था
शिद्दत-ए-इश्क़ में करना था इज़ाफ़ा 'राग़िब'
और बे-ताबी-ए-जज़बात को कम रखना था
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