Vipul Kumar

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@vipul-kumar

Vipul Kumar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Vipul Kumar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Shayari
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Sher

बचा के आँख बिछड़ जाएँ उस से चुपके से अभी तो अपनी तरफ़ ध्यान भी ज़ियादा नहीं — Vipul Kumar
हर मुलाक़ात पे सीने से लगाने वाले कितने प्यारे है मुझे छोड़ के जाने वाले — Vipul Kumar
उम्र गुज़री उस का चेहरा देखते और जी लेते तो दुनिया देखते — Vipul Kumar
उस हिज्र पे तोहमत कि जिसे वस्ल की ज़िद हो उस दर्द पे ला'नत की जो अश'आर में आ जाए — Vipul Kumar
उसे तो दौलत-ए-दुनिया भी कम भी पाने को मिरी तो ज़ात का मीज़ान भी ज़ियादा नहीं — Vipul Kumar
मैं तो शब-ए-फ़िराक़ था तुम एक उम्र थी फिर भी ज़ियादा तुम से गुज़ारा गया मुझे — Vipul Kumar
कुछ इस लिए भी तेरी आरज़ू नहीं है मुझे मैं चाहता हूँ मेरा इश्क़ जावेदानी हो — Vipul Kumar
इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए और फिर तमाम उम्र किसी के नहीं हुए — Vipul Kumar

Ghazal

सर-ब-ज़ानू हैं कि यूँँ ही रात भर रहते हैं हम फैल जाती है ज़मीं और मुख़्तसर रहते हैं हम भागता हूँ आलम-ए-इदराक से मैं, मुझ सेे दिल हाँ ख़बर आती है लेकिन बे-ख़बर रहते हैं हम इक दिया जलता है ताक़ों में नुमाइश के लिए एक आईना है जिस में मुश्तहर रहते हैं हम सुब्ह तक बिस्तर में बाक़ी इक शिकन रहता है वो शाम तक दफ़्तर में ख़ाली नींद भर रहते हैं हम कट रहे हैं उग रहे हैं मौसमों के साथ साथ कोई युग कोई सदी हो वक़्त पर रहते हैं हम रात भर उठ उठ के पानी ढूँडते हैं साहिबो एक तश्ना-ख़्वाब के ज़ेर-ए-असर रहते हैं हम — Vipul Kumar
सवाद-ए-शाम में सब वहशियों का जलसा हो लहू का राग हो और नग़मा-साज़ प्यासा हो सुना रहे हैं मुझे लोग दास्ताँ उस की इस एतिमाद से जैसे किसी ने देखा हो किसी के होंट सुरों में कलाम करते हों किसी का रंज उदासी की तान लेता हो किसी कनार की ख़ुशबू से शे'र खुलने लगें कि बात बात नहीं हो बस इक इशारा हो बला-ए-सर्द कोई शाल हो सितारों जड़ा ख़िज़ाँ की शाम हो और सर्दियों का क़िस्सा हो गिला न कर कि गिला मातम-ए-मोहब्बत है गले से लग के बता मुझ सेे जो भी शिकवा हो अब आ गए हैं कि आख़िर तेरी गली का भरम कहीं किवाड़ की दस्तक ही से न खुलता हो मैं ये समझ के रग-ए-गुल से बात करता हूँ कोई तो बाग़ में मेरा हिसाब लिखता हो — Vipul Kumar
नज़र इक साया-ए-अब्र-ए-बला पर जम गई है ये कालिख दिल से उतरी है घटा पर जम गई है मैं हर बुत को हरारत की कशिश बतला रहा हूँ अजब इक बर्फ़ मेरे देवता पर जम गई है ज़रूर अगली रुतें अब रास्ता भटकेंगी इस सेे ये जो कुछ रेत मेरे नक़्श-ए-पा पर जम गई है बदन पर नक़्श रह जाते हैं और दिल में नदामत किसी लम्हे की उजलत दस्त-ओ-पा पर जम गई है हमारे सर तो आख़िर ख़ाक ही होने थे इक दिन ये कैसी रौशनी तेग़-ए-जफ़ा पर जम गई है छुपाना चाहता था मैं उसे शे'रों में अपने अब इक आलम की आँख उस बे-वफ़ा पर जम गई है हमारे पाँव में चक्कर है वो भी चाँद का है सितारों की थकन उस की रिदा पर जम गई है — Vipul Kumar
जिस्म भी आँख के पानी से हरा रहता था सर भी क्या सर था कि ज़ानू पे पड़ा रहता था आह-ओ-फ़रियाद के मौसम भी गुज़रते थे मगर ऐसी बस्ती ही नहीं थी कि ख़ुदा रहता था उस के बरताव से समझा कि मुक़द्दर में है प्यास नहर था और सराबों से घिरा रहता था शीशा-ए-शाम-ए-शिकस्ता में शफ़क़ फूटती थी रात भर ‘अक्स मेरा ख़ूँ में सना रहता था आँख पर आँख पड़ी रहती थी और फूल पे फूल उस के हमराह ‘अजब बाग़ सजा रहता था आप ही आप उलझ जाती थीं बातें अपनी या कोई चोर कहीं दिल में छुपा रहता था मैं ने दरयाफ़्त किया एक ही शख़्स ऐसा 'कुमार' मैं न गुज़रूँ भी तो रस्ते में बिछा रहता था — Vipul Kumar