सर निगूँ है कि यूँँ ही शर्म-ए-नज़र उठती है
आँख आफ़ाक़ से मिलती है अगर उठती है
ऐसे नाज़ुक को कहाँ मौसम-ए-सरमा का दिमाग़
धुंध भी जिस्म को छू ले तो सिहर उठती है
देखिए कौनसे ‘आलम में हो अगली गर्दिश
अपनी मिट्टी जो यहाँ बार-ए-दिगर उठती है
नींद आती है 'कुमार' आख़िर-ए-शब आँखों में
सोने लगता हूँ कि इक आह-ए-सहर उठती है
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