us hijr pe tohmat ki jise vasl kii zid hous dard pe la'nat kii jo ashaar mein aa jaaye | उस हिज्र पे तोहमत कि जिसे वस्ल की ज़िद हो

  - Vipul Kumar

उस हिज्र पे तोहमत कि जिसे वस्ल की ज़िद हो
उस दर्द पे ला'नत की जो अशआ'र में आ जाए

  - Vipul Kumar

Motivational Shayari in Hindi

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    पिघलते जिस्मों की रौशनी से डरा हुआ हूँ
    मैं छू रहा हूँ जिसे उसी से डरा हुआ हूँ

    मुझे उसी एक दुख की लत है उसी को लाओ
    मैं ताज़ा ज़ख़्मों की ताज़गी से डरा हुआ हूँ

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    Vipul Kumar
    जिस्म भी आँख के पानी से हरा रहता था
    सर भी क्या सर था कि ज़ानू पे पड़ा रहता था

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    ऐसी बस्ती ही नहीं थी कि ख़ुदा रहता था

    उसके बरताव से समझा कि मुक़द्दर में है प्यास
    नहर था और सराबों से घिरा रहता था

    शीशा-ए-शाम-ए-शिकस्ता में शफ़क़ फूटती थी
    रात भर ‘अक्स मेरा ख़ूँ में सना रहता था

    आँख पर आँख पड़ी रहती थी और फूल पे फूल
    उसके हमराह ‘अजब बाग़ सजा रहता था

    आप ही आप उलझ जाती थीं बातें अपनी
    या कोई चोर कहीं दिल में छुपा रहता था

    मैंने दरयाफ़्त किया एक ही शख़्स ऐसा 'कुमार'
    मैं न गुज़रूँ भी तो रस्ते में बिछा रहता था
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    Vipul Kumar
    तेरा प्यार मेरी ज़िंदगी में
    बहार ले कर आया है

    तेरे आने से पहले हर दिन
    पतझड़ हुआ करता था
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    Vipul Kumar
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    सुख़न का मस'अला लफ़्ज़-ए-किताब तक नहीं है
    ये कुल्लियात मेरा इंतिख़ाब तक नहीं है

    गँवा के 'उम्र उठा हूँ तुम्हारी नींद से मैं
    मलाल आँख में ऐसा है ख़्वाब तक नहीं है

    ब-ज़ो'म-ए-सीना-ए-ख़ाली मिलेंगे अब उससे
    कि देख ले तो कहे इज़्तिराब तक नहीं है

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    ख़ुदा करे कि तेरे पाँव से उठें ही नहीं
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    Vipul Kumar
    इस खराबी की कोई हद है की मेरे घर से
    संग उठाए दर-ओ-दिवार निकल आते हैं

    क्या क़यामत है की दर-क़ाफ़िला-ए-रहराव-इ -शौक़
    कुछ क़यामत के भी हमवार निकल आते हैं

    इतना हैरान न हो मेरी अना पर प्यारे
    इश्क़ में भी कई खुद्दार निकल आते हैं

    इस क़दर खस्ता-तानी है की गले मिलते हुए
    उस की बांहों से भी हम पर निकल आते हैं

    जुज़ तेरे खुद भी मैं तस्लीम नहीं हूँ खुद को
    दिल से पूछूं भी तो इंकार निकल आते हैं
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    Vipul Kumar

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