ख़ाना-ए-सोख़्ता-ए-दिल का मकीं कोई नहीं
तू नहीं है तो मेरे शो’ला-नशीं कोई नहीं
चाँद चेहरे भी चमकते हैं गुल-ओ-सुम्बुल भी
तेरी दुनिया में मगर दिल सा नगीं कोई नहीं
एक आवाज़ लगाता हूँ कोई है भी यहाँ
एक आवाज़ सी आती है कहीं कोई नहीं
एक ‘आलम है फ़रावानी-ए-मर्दुम से मगर
मैं जहाँ जिस को बुलाता हूँ वहीं कोई नहीं
— Vipul Kumar















