सर-ब-ज़ानू हैं कि यूँँ ही रात भर रहते हैं हम
फैल जाती है ज़मीं और मुख़्तसर रहते हैं हम
भागता हूँ आलम-ए-इदराक से मैं, मुझ से दिल
हाँ ख़बर आती है लेकिन बे-ख़बर रहते हैं हम
इक दिया जलता है ताक़ों में नुमाइश के लिए
एक आईना है जिस
में मुश्तहर रहते हैं हम
सुब्ह तक बिस्तर में बाक़ी इक शिकन रहता है वो
शाम तक दफ़्तर में ख़ाली नींद भर रहते हैं हम
कट रहे हैं उग रहे हैं मौसमों के साथ साथ
कोई युग कोई सदी हो वक़्त पर रहते हैं हम
रात भर उठ उठ के पानी ढूँडते हैं साहिबो
एक तश्ना-ख़्वाब के ज़ेर-ए-असर रहते हैं हम
— Vipul Kumar















