Hafeez Jalandhari

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Hafeez Jalandhari shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Hafeez Jalandhari's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

सारी दुनिया को है ग़लत-फ़हमी मुझ पे तू मेहरबान है प्यारे — Hafeez Jalandhari
इलाही एक ग़म-ए-रोज़गार क्या कम था कि इश्क़ भेज दिया जान-ए-मुब्तला के लिए — Hafeez Jalandhari
कोई दवा न दे सके मशवरा-ए-दुआ दिया चारागरों ने और भी दर्द दिल का बढ़ा दिया — Hafeez Jalandhari
नहीं इताब-ए-ज़माना ख़िताब के क़ाबिल तिरा जवाब यही है कि मुस्कुराए जा — Hafeez Jalandhari
किस मुँह से कह रहे हो हमें कुछ ग़रज़ नहीं किस मुँह से तुम ने वा'दा किया था निबाह का — Hafeez Jalandhari
बुत-कदे से चले हो काबे को क्या मिलेगा तुम्हें ख़ुदा के सिवा — Hafeez Jalandhari
मुझे तो इस ख़बर ने खो दिया है सुना है मैं कहीं पाया गया हूँ — Hafeez Jalandhari
ज़िंदगी फ़िरदौस-ए-गुम-गश्ता को पा सकती नहीं मौत ही आती है ये मंज़िल दिखाने के लिए — Hafeez Jalandhari
मुझ से क्या हो सका वफ़ा के सिवा मुझ को मिलता भी क्या सज़ा के सिवा — Hafeez Jalandhari
ओ दिल तोड़ के जाने वाले दिल की बात बताता जा अब मैं दिल को क्या समझाऊँ मुझ को भी समझाता जा — Hafeez Jalandhari
क्यूँँ हिज्र के शिकवे करता है क्यूँँ दर्द के रोने रोता है अब इश्क़ किया तो सब्र भी कर इस में तो यही कुछ होता है — Hafeez Jalandhari
अब मुझे मानें न मानें ऐ 'हफ़ीज़' मानते हैं सब मिरे उस्ताद को — Hafeez Jalandhari
दिल लगाओ तो लगाओ दिल से दिल दिल-लगी ही दिल-लगी अच्छी नहीं — Hafeez Jalandhari
हाँ मैं तो लिए फिरता हूँ इक सजदा-ए-बेताब उन से भी तो पूछो वो ख़ुदा हैं कि नहीं हैं — Hafeez Jalandhari
रंग बदला यार ने वो प्यार की बातें गईं वो मुलाक़ातें गईं वो चाँदनी रातें गईं — Hafeez Jalandhari
हाए कोई दवा करो हाए कोई दुआ करो हाए जिगर में दर्द है हाए जिगर को क्या करूँँ — Hafeez Jalandhari
तसव्वुर में भी अब वो बे-नक़ाब आते नहीं मुझ तक क़यामत आ चुकी है लोग कहते हैं शबाब आया — Hafeez Jalandhari
आने वाले जाने वाले हर ज़माने के लिए आदमी मज़दूर है राहें बनाने के लिए — Hafeez Jalandhari
जिस ने इस दौर के इंसान किए हैं पैदा वही मेरा भी ख़ुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं — Hafeez Jalandhari
हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके तुम ने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके — Hafeez Jalandhari

Ghazal

कम-बख़्त दिल बुरा हुआ तिरी आह आह का हुस्न-ए-निगाह भी न रहा गाह गाह का छेड़ो न मीठी नींद में ऐ मुनकर-ओ-नकीर सोने दो भाई मैं थका-माँदा हूँ राह का मेरे मुक़ल्लिदों को मिरी राह-ए-शौक़ में हर गाम पर निशान मिला सज्दा-गाह का दिल सा गवाह हश्र में आ कर फिसल गया अब रहम पर मुआमला है दाद-ख़्वाह का किस मुँह से कह रहे हो हमें कुछ ग़रज़ नहीं किस मुँह से तुम ने व'अदा किया था निबाह का दिल लेने वाली बात इसी दिल से पूछिए मालिक यही है मेरे सफ़ेद ओ सियाह का पेश-ए-ख़ुदा चलो तो मज़ा जब है ऐ 'हफ़ीज़' नारा हो लब पे अशहदो-अन-ला-इलाह का — Hafeez Jalandhari
कल ज़रूर आओगे लेकिन आज क्या करूँँ बढ़ रहा है क़ल्ब का इख़्तिलाज क्या करूँँ क्या करूँँ कोई नहीं एहतियाज दोस्त को और मुझ को दोस्त की एहतियाज क्या करूँँ अब वो फ़िक्रमंद हैं कह दिया तबीब ने इश्क़ है जुनूँ नहीं मैं इलाज क्या करूँँ ग़ैरत-ए-रक़ीब का शिकवा कर रहे हो तुम इस मुआमले में सख़्त है मिज़ाज क्या करूँँ मा-सिवा-ए-आशिक़ी और कुछ किया भी हो सूझता ही कुछ नहीं काम-काज क्या करूँँ महव-ए-कार-ए-दीं हूँ मैं बोरिया-नशीं हूँ मैं राहज़न नहीं हूँ मैं तख़्त-ओ-ताज क्या करूँँ ज़ोर और ज़र बग़ैर इश्क़ क्या करूँँ 'हफ़ीज़' चल गया है मुल्क में ये रिवाज क्या करूँँ — Hafeez Jalandhari
इश्क़ में छेड़ हुई दीदा-ए-तर से पहले ग़म के बादल जो उठे तो यहीं पर से पहले अब जहन्नम में लिए जाती है दिल की गर्मी आग चमकी थी ये अल्लाह के घर से पहले हाथ रख रख के वो सीने पे किसी का कहना दिल से दर्द उठता है पहले कि जिगर से पहले दिल को अब आँख की मंज़िल में बिठा रक्खेंगे इश्क़ गुज़रेगा इसी राह-गुज़र से पहले वो हर वादे से इनकार ब-तर्ज़-ए-इक़रार वो हर इक बात पे हाँ लफ़्ज़-ए-मगर से पहले मेरे क़िस्से पे वही रौशनी डाले शायद शम-ए-कम-माया जो बुझती है सहरस पहले चाक-ए-दामानी-ए-गुल का है गिला क्या बुलबुल कि उलझता है ये ख़ुद बाद-ए-सहरस पहले कुछ समझदार तो हैं नाश उठाने वाले ले चले हैं मुझे इस राह-गुज़र से पहले दिल नहीं हारते यूँँ बाज़ी-ए-उल्फ़त में 'हफ़ीज़' खेल आग़ाज़ हुआ करता है सर से पहले — Hafeez Jalandhari
इन गेसुओं में शाना-ए-अरमाँ न कीजिए ख़ून-ए-जिगर से दावत-ए-मिज़्गाँ न कीजिए मर जाइए न कीजिए ज़िक्र-ए-बहिश्त-ओ-हूर अब ख़्वाब को भी ख़्वाब-ए-परेशाँ न कीजिए बाक़ी हो जो भी हश्र यहीं पर उठाइए मरने के ब'अद ज़ीस्त का सामाँ न कीजिए दोज़ख़ को दीजिए न परागंदगी मिरी शीराज़ा-ए-बहिश्त परेशाँ न कीजिए शायद यही जहाँ किसी मजनूँ का घर बने वीराना भी अगर है तो वीराँ न कीजिए क्या नाख़ुदा बग़ैर कोई डूबता नहीं मुझ को मिरे ख़ुदा से पशेमाँ न कीजिए है बुत-कदे में भी उसे ईमान का ख़याल क्यूँँ ए'तिबार-ए-मर्द-ए-मुसलमाँ न कीजिए हम से ये बार-ए-लुत्फ़ उठाया न जाएगा एहसाँ ये कीजिए कि ये एहसाँ न कीजिए आईना देखिए मिरी सूरत न देखिए मैं आईना नहीं मुझे हैराँ न कीजिए तू ही अज़ीज़-ए-ख़ातिर-ए-अहबाब है 'हफ़ीज़' क्या कीजिए अगर तुझे क़ुर्बां न कीजिए — Hafeez Jalandhari
मजाज़ ऐन-ए-हक़ीक़त है बा-सफ़ा के लिए बुतों को देख रहा हूँ मगर ख़ुदा के लिए असर में हो गए क्यूँँ सात आसमाँ हाएल अभी तो हाथ उठे ही नहीं दुआ के लिए हुआ बस एक ही नाले में दम फ़ना अपना ये ताज़ियाना था उम्र-ए-गुरेज़-पा के लिए इलाही एक ग़म-ए-रोज़गार क्या कम था कि इश्क़ भेज दिया जान-ए-मुब्तला के लिए हमें तो दावर-ए-महशर को छोड़ते ही बनी ख़ता-ए-इश्क़ न काफ़ी हुई सज़ा के लिए उसी को राह दिखाता हूँ जो मिटाए मुझे मैं हूँ तो नूर मगर चश्म-ए-नक़श-ए-पा के लिए ये जानता हूँ कि है निस्फ़ शब मगर साक़ी ज़रा सी चाहिए इक मर्द-ए-पारसा के लिए इलाही तेरे करम से मिले मय ओ माशूक़ अब इल्तिजा है बरसती हुई घटा के लिए 'हफ़ीज़' आज़िम-ए-काबा हुआ है जाने दो अब उस पे रहम करो ऐ बुतो ख़ुदा के लिए — Hafeez Jalandhari
कोई दवा न दे सके मशवरा-ए-दुआ दिया चारागरों ने और भी दर्द दिल का बढ़ा दिया दोनों को दे के सूरतें साथ ही आइना दिया इश्क़ बिसोरने लगा हुस्न ने मुस्कुरा दिया ज़ौक़-ए-निगाह के सिवा शौक़-ए-गुनाह के सिवा मुझ को बुतों से क्या मिला मुझ को ख़ुदा ने क्या दिया थी न ख़िज़ाँ की रोक-थाम दामन-ए-इख़्तियार में हम ने भरी बहार में अपना चमन लुटा दिया हुस्न-ए-नज़र की आबरू सनअत-ए-बरहमन से है जिस को सनम बना लिया उस को ख़ुदा बना दिया दाग़ है मुझ पे इश्क़ का मेरा गुनाह भी तो देख उस की निगाह भी तो देख जिस ने ये गुल खिला दिया इश्क़ की मम्लिकत में है शोरिश-ए-अक़्ल-ए-ना-मुराद उभरा कहीं जो ये फ़साद दिल ने वहीं दबा दिया नक़्श-ए-वफ़ा तो मैं ही था अब मुझे ढूँडते हो क्या हर्फ़-ए-ग़लत नज़र पड़ा तुम ने मुझे मिटा दिया ख़ुब्स-ए-दरूँ दिखा दिया हर दहन-ए-ग़लीज़ ने कुछ न कहा 'हफ़ीज़' ने हँस दिया मुस्कुरा दिया — Hafeez Jalandhari
ये क्या मक़ाम है वो नज़ारे कहाँ गए वो फूल क्या हुए वो सितारे कहाँ गए यारान-ए-बज़्म जुरअत-ए-रिंदाना क्या हुई उन मस्त अँखड़ियों के इशारे कहाँ गए एक और दौर का वो तक़ाज़ा किधर गया उमडे हुए वो होश के धारे कहाँ गए उफ़्ताद क्यूँँ है लग़्ज़िश-ए-मस्ताना क्यूँँ नहीं वो उज़्र-ए-मय-कशी के सहारे कहाँ गए दौरान-ए-ज़लज़ला जो पनाह-ए-निगाह थे लेटे हुए थे पाँव पसारे कहाँ गए बाँधा था क्या हवा पे वो उम्मीद का तिलिस्म रंगीनी-ए-नज़र के ग़ुबारे कहाँ गए उठ उठ के बैठ बैठ चुकी गर्द राह की यारो वो क़ाफ़िले थके हारे कहाँ गए हर मीर-ए-कारवाँ से मुझे पूछना पड़ा साथी तिरे किधर को सिधारे कहाँ गए फ़रमा गए थे राह में बैठ इंतिज़ार कर आए नहीं पलट के वो प्यारे कहाँ गए तुम से भी जिन का अहद-ए-वफ़ा उस्तुवार था ऐ दुश्मनों वो दोस्त हमारे कहाँ गए कश्ती नई बनी कि उठा ले गया कोई तख़्ते जो लग गए थे किनारे कहाँ गए अब डूबतों से पूछता फिरता है नाख़ुदा जिन को लगा चुका हूँ किनारे कहाँ गए बेताब तेरे दर्द से थे चारा-गर 'हफ़ीज़' क्या जानिए वो दर्द के मारे कहाँ गए — Hafeez Jalandhari
उठो अब देर होती है वहाँ चल कर सँवर जाना यक़ीनी है घड़ी दो में मरीज़-ए-ग़म का मर जाना मुझे डर है गुलों के बोझ से मरक़द न दब जाए उन्हें आदत है जब आना ज़रूर एहसान धर जाना हबाब आ सामने सब वलवले जोश-ए-जवानी के ग़ज़ब था क़ुल्ज़ुम-ए-उम्मीद का चढ़ कर उतर जाना यहाँ जुज़ कश्ती-ए-मौज-ए-बला कुछ भी न पाओगे इसी के आसरे दरिया-ए-हस्ती से उतर जाना मबादा फिर असीर-ए-दाम-ए-अक़्ल-ओ-होश हो जाऊँ जुनूँ का इस तरह अच्छा नहीं हद से गुज़र जाना 'हफ़ीज़' आग़ाज़ से अंजाम तक रहज़न ने पहुँचाया उसी को हम-सफ़र पाया उसी को हम-सफ़र जाना — Hafeez Jalandhari
हैरान न हो देख मैं क्या देख रहा हूँ बंदे तिरी सूरत में ख़ुदा देख रहा हूँ वो अपनी जफ़ाओं का असर देख रहे हैं मैं मअनी-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा देख रहा हूँ दुज़्दीदा निगाहों से किधर देख रहे हो क्या बात है! ये आज मैं क्या देख रहा हूँ है हुस्न यही शय तो गुमाँ और न कीजे सौदा नहीं मतलूब ज़रा देख रहा हूँ किस तरह न क़ाइल हूँ दुआ-ए-सहरी का उस लब पे तबस्सुम की ज़िया देख रहा हूँ क्यूँँ अर्ज़-ए-वतन तंग है ये बात ही क्या है अब तो फ़क़त इक क़ब्र की जा देख रहा हूँ मर जाने की धमकी हुई तम्हीद-ए-तमाशा मैं ने कहा देख उस ने कहा देख रहा हूँ — Hafeez Jalandhari
न कर दिल-जूई ऐ सय्याद मेरी कि फ़ितरत है बहुत आज़ाद मेरी असीरी से रिहाई पाने वालो तुम्हें पहुँचे मुबारकबाद मेरी सहारा क्यूँँ लिया था नाख़ुदा का ख़ुदा भी क्यूँँ करे इमदाद मेरी भुला दो मुझ को लेकिन याद रखना सताएगी तुम्हें भी याद मेरी फ़रिश्ते क्या मुरत्तब कर सकेंगे बहुत बे-रब्त है रूदाद मेरी पसंद आने लगी थी सर-बुलंदी यही थी अव्वलीं उफ़्ताद मेरी क्या पाबंद-ए-नय नाले को मैं ने ये तर्ज़-ए-ख़ास है ईजाद मेरी मिरे अश'आर पर चुप रहने वाले तिरे हिस्से में आई दाद मेरी क़ज़ा का ज़ुल्म हद से बढ़ गया है कोई सुनता नहीं फ़रियाद मेरी ख़ुदावंदा क़ज़ा ने छीन ली है मिरे आग़ोश से 'इरशाद' मेरी — Hafeez Jalandhari
इक बार फिर वतन में गया जा के आ गया लख़्त-ए-जिगर को ख़ाक में दफ़ना के आ गया हर हम-सफ़र पे ख़िज़्र का धोका हुआ मुझे आब-ए-बक़ा की राह से कतरा के आ गया हूर-ए-लहद ने छीन लिया तुझ को और मैं अपना सा मुँह लिए हुए शर्मा के आ गया दिल ले गया मुझे तिरी तुर्बत पे बार बार आवाज़ दे के बैठ के उकता के आ गया रोया कि था जहेज़ तिरा वाजिब-उल-अदा मेंह मोतियों का क़ब्र पे बरसा के आ गया मेरी बिसात क्या थी हुज़ूर-ए-रज़ा-ए-दोस्त तिनका सा एक सामने दरिया के आ गया अब के भी रास आई न हुब्ब-ए-वतन 'हफ़ीज़' अब के भी एक तीर-ए-क़ज़ा खा के आ गया — Hafeez Jalandhari
अगर मौज है बीच धारे चला चल वगरना किनारे किनारे चला चल इसी चाल से मेरे प्यारे चला चल गुज़रती है जैसे गुज़ारे चला चल तुझे साथ देना है बहरूपियों का नए से नया रूप धारे चला चल ख़ुदा को न तकलीफ़ दे डूबने में किसी नाख़ुदा के सहारे चला चल पहुँच जाएँगे क़ब्र में पाँव तेरे पसारे चला चल पसारे चला चल ये ऊपर का तबक़ा ख़ला ही ख़ला है हवा ओ हवस के ग़ुबारे चला चल डुबोया है तू ने हया का सफ़ीना मिरे दोस्त सीना उभारे चला चल मुसलसल बुतों की तमन्ना किए जा मुसलसल ख़ुदा को पुकारे चला चल यहाँ तो बहर-ए-हाल झुकना पड़ेगा नहीं तो किसी और द्वारे चला चल तुझे तो अभी देर तक खेलना है इसी में तो है जीत हारे चला चल न दे फ़ुर्सत-ए-दम-ज़दन ओ ज़माने नए से नया तीर मारे चला चल शब-ए-तार है ता-ब-सुब्ह-ए-क़यामत मुक़द्दर है गर्दिश सितारे चला चल कहाँ से चला था कहाँ तक चलेगा चला चल मसाफ़त के मारे चला चल बसीरत नहीं है तो सीरत भी क्यूँँ हो फ़क़त शक्ल ओ सूरत सँवारे चला चल 'हफ़ीज़' इस नए दौर में तुझ को फ़न का नशा है तो प्यारे उतारे चला चल — Hafeez Jalandhari
उन को जिगर की जुस्तुजू उन की नज़र को क्या करूँँ मुझ को नज़र की आरज़ू अपने जिगर को क्या करूँँ रात ही रात में तमाम तय हुए उम्र के मक़ाम हो गई ज़िंदगी की शाम अब मैं सहर को क्या करूँँ वहशत-ए-दिल फ़ुज़ूँ तो है हाल मिरा ज़ुबूँ तो है इश्क़ नहीं जुनूँ तो है उस के असर को क्या करूँँ फ़र्श से मुतमइन नहीं पस्त है ना-पसंद है अर्श बहुत बुलंद है ज़ौक़-ए-नज़र को क्या करूँँ हाए कोई दवा करो हाए कोई दुआ करो हाए जिगर में दर्द है हाए जिगर को क्या करूँँ अहल-ए-नज़र कोई नहीं इस लिए ख़ुद-पसंद हूँ आप ही देखता हूँ मैं अपने हुनर को क्या करूँँ तर्क-ए-तअल्लुक़ात पर गिर गई बर्क़-ए-इल्तिफ़ात राह-गुज़र में मिल गए राह-गुज़र को क्या करूँँ — Hafeez Jalandhari

Nazm

ऐ शानदार गंगा ऐ पुर-बहार गंगा गंगोत्री से निकली कैसी उछल उछल कर और पर्बतों से उतरी पहलू बदल बदल कर पत्थर बहाए तू ने जो रास्ते में आए कूदी बुलंदियों से जल्वे अजब दिखाए इक राह में बनाए सौ आबशार गंगा ऐ शानदार गंगा ऐ पुर-बहार गंगा वो अपनी रौ में बहना ऊँचे सुरों में गाना चिड़ियों का मस्त रहना सुन कर तिरा तराना और वो जो सुन के नग़्में देते थे दाद तुझ को लेते थे गोदियों में जो शाद-शाद तुझ को करते हैं याद तुझ को वो कोहसार गंगा ऐ शानदार गंगा ऐ पुर-बहार गंगा जंगल पहाड़ छोड़े मैदाँ बसाए तू ने अब और ही तरह के नक़्शे जमाए तू ने गंगा बहाई ऐसी खेतों को भर दिया है पौदों को जान दी है फूलों को ज़र दिया है सैराब कर दिया है हर लाला-ज़ार गंगा ऐ शानदार गंगा ऐ पुर-बहार गंगा हैं शहर प्यारे प्यारे अक्सर तिरे किनारे तीरथ तिरे किनारे मंदिर तिरे किनारे जल है तिरा पवित्र मिट्टी भी तेरी प्यारी पाकीज़गी की देवी पाकीज़ा है तू सारी तुझ को तिरे पुजारी करते हैं प्यार गंगा ऐ शानदार गंगा ऐ पुर-बहार गंगा मशहूर हो गई तू हिन्दोस्ताँ की माता तुझ में हर एक हिन्दू अश्नान को है आता हिन्दोस्तानियों की हमदम है तू पुरानी दुनिया में कोई दरिया तेरा नहीं है सानी है तेरा साफ़ पानी अमृत की धार गंगा ऐ शानदार गंगा ऐ पुर-बहार गंगा रातों को चाँद तारे लहरों में झूमते हैं फूलों भरे किनारे पैरों को चूमते हैं सूरज बिखेरता है किरनों के हार तुझ पर और करती हैं हवाएँ नक़्श-ओ-निगार तुझ पर सब हैं निसार तुझ पर सब हैं निसार गंगा ऐ शानदार गंगा ऐ पुर-बहार गंगा — Hafeez Jalandhari
आज बादल ख़ूब बरसा और बरस कर खुल गया गुल्सिताँ की डाली डाली पत्ता पत्ता धुल गया देखना क्या धुल गया सारे का सारा आसमाँ ऊदा ऊदा नीला नीला प्यारा प्यारा आसमाँ हट गया बादल का पर्दा मिल गई किरनों को राह सल्तनत पर अपनी फिर ख़ुर्शीद ने डाली निगाह धूप में है घास पर पानी के क़तरों की चमक मात है इस वक़्त मोती और हीरे की दमक दे रही है लुत्फ़ क्या सरसब्ज़ पेड़ों की क़तार और हरी शाख़ों पे है रंगीन फूलों की बहार क्या परिंदे फिर रहे हैं चहचहाते हर तरफ़ रागनी बरसात की ख़ुश हो के गाते हर तरफ़ देखना वो क्या अचम्भा है अरे वो देखना आसमाँ पर इन दरख़्तों से परे वो देखना ये कोई जादू है या सच-मुच है इक रंगीं कमाँ वाह वा कैसा भला लगता है ये प्यारा समाँ किस मुसव्विर ने भरे हैं रंग ऐसे ख़ुशनुमा इस का हर इक रंग है आँखों में जैसे खुब गया इक जगह कैसे इकट्ठे कर दिए हैं सात रंग शोख़ हैं सातों के सातों इक नहीं है मात रंग है ये क़ुदरत का नज़ारा और क्या कहिए इसे बस यही जी चाहता है देखते रहिए इसे नन्हे नन्हे जम्अ'' थे पानी के कुछ क़तरे वहाँ उन पे डाला अक्स सूरज ने बना दी ये कमाँ देखो देखो अब मिटी जाती है वो प्यारी धनक देखते ही देखते गुम हो गई सारी धनक फिर हवा में मिल गई वो सब की सब कुछ भी नहीं आँखें मल मल कर न देखो आओ अब कुछ भी नहीं — Hafeez Jalandhari
मास्टर जी बाहर गए हैं मास्टर जी गए ज़रा बाहर अब नज़र क्या रहे किताबों पर दिल ही दिल में हैं सारे लड़के शाद गोया क़ैदी थे अब हुए आज़ाद अब किताबें कहाँ सबक़ किस का पढ़ना-वढ़ना ख़याल से खिसका एक हँसता है एक गाता है और इक चुटकियाँ बजाता है एक बैठे ही बैठे सोता है और इक झूट-मूट रोता है मशवरे कर रहे हैं दो बाहम आओ चुपके से उठ के चल दें हम एक गोशे में गोलियाँ खेलें या ग्रांऊड में चल के डंड पेलें कॉपी इक जल्द जल्द भरता है दूसरा उस से नक़ल करता है घर से लाए नहीं हैं कर के सवाल मास्टर जी से अब करेंगे चाल इक ने बाँधा है गाल पर रूमाल ताकि पूछें न इस से कोई सवाल दाढ़ के दर्द का बहाना है छुट्टी लेनी है घर को जाना है साथ बातें भी होती जाती हैं शोख़ घातें भी होती जाती हैं एक कहता है नज़्म याद नहीं मास्टर साहब आ न जाएँ कहीं यूँँ ही टर्ख़ाऊँगा सुनेंगे जब आता-वाता मुझे नहीं मतलब मा'नी मुझ को सुझाते जाना तुम चुपके चुपके बताते जाना तुम और जोगराफ़ चुप अरे चुप कर मीम अलिफ़ सीन मास टे रे टर मास्टर जी के आ जाने पर झट मिल गई सब को ख़बर ऐसे इशारे हो गए उस्ताद का मुँह देख कर चुप चाप सारे हो गए अब इस तरह ख़ामोश हैं गोया कभी बोले न थे आँखें उठाई ही न थीं और लब कभी खोले न थे अब हैं किताबें सामने बाहम निगह मिलती नहीं हैं भागने वाले भी चुप अब उन को रह मिलती नहीं अब दाढ़ भी दुखती नहीं अब दर्द सारा थम गया हाँ हाथ है लेकिन वहीं गोया वहीं पर जम गया चेहरे किताबों से छुपे सारी ज़बानें चुप हुईं चुटकी वहीं पर रह गई सीटी की तानें चुप हुईं अब कापियाँ कम हो गईं अब नक़्ल चल सकती नहीं उस्ताद से गोया कोई अब अक़्ल चल सकती नहीं ये नन्हे मुन्ने से जो हैं शोख़ी में हज़रत एक हैं सूरत तो देखो आप की गोया बहुत ही नेक हैं दिल में शरारत है भरी दम साध रक्खे हैं मगर देखो फिर इन की शोख़ियाँ उस्ताद फिर जाए अगर — Hafeez Jalandhari
नन्ही हो तुम बच्ची हो तुम सब अक़्ल की कच्ची हो तुम आओ मिरी बातें सुनो चालें सुनो घातें सुनो उस्ताद की हर बात को अपनी गिरह में बाँध लो जब तुम जवाँ हो जाओगी मछली की माँ हो जाओगी फिर याद आएँगी तुम्हें लहरे दिखाएँगी तुम्हें बातें हमारी मछलिओ ऐ प्यारी प्यारी मछलिओ रोहू की बेटी कान धर सांवल की बच्ची आ इधर और नन्ही मुन्नी तू भी सुन ओ थुन मथुन्नी तू भी सुन चौड़े दहाने वालियो और दुम हिलाने वालियो तुम भी सुनो चमकीलियो ऐ काली नीली पीलियो तुम को यहाँ पर देख कर नद्दी पे आ जाए अगर कोई शिकारी मछलियो ऐ प्यारी प्यारी मछलियो जब वो किनारे बैठ कर डोरी को फेंकेगा इधर नन्हे से काँटे पर चढ़ा होगा मज़े का केचुआ लपकोगी तुम सब बे-ख़बर इक तर निवाला जान कर काँटा मगर चुभ जाएगा बस हल्क़ में खुब जाएगा तड़पोगी और घबराओगी लेकिन सभी फँस जाओगी तुम बारी बारी मछलियो ऐ प्यारी प्यारी मछलियो जब केचुआ खा जाओ तुम बस लौट कर आ जाओ तुम लेकिन ज़रा सा छेड़ दो काँटे की पतली डोर को सरकंडा जब खिंच आएगा धोका शिकारी खाएगा समझेगा मछली फँस गई खींचेगा बंसी डोर की फिर शक्ल उस की देखना होती है कैसी देखना वो बे-क़रारी मछलियो ऐ प्यारी प्यारी मछलियो अब वो बहुत झल्लाएगा चीख़ेगा और चिल्लाएगा फिर केचवे पर केचुआ काँटे में भरता जाएगा तुम भी इसी तरकीब से खाती ही जाना केचुवे आख़िर शिकारी हार कर उठेगा दिल को मार कर हीला-गरी रह जाएगी सारी धरी रह जाएगी थैली पिटारी मछलियो ऐ प्यारी प्यारी मछलियो — Hafeez Jalandhari
आ जा री चिड़िया आ जा री चिड़िया मुंडेर पर क्यूँ करती है चूँ चूँ आ जा तुझे मैं दाना खिलाऊँ रोटी के भूरे छत पर बिखेरूँ ले अपना खाजा खा जा री चिड़िया सुन ले री चिड़िया सुन ले री चिड़िया क्या नन्हे नन्हे बच्चे हैं तेरे करते हैं चीं चीं इतने सवेरे ले मैं ने गेहूँ छत पर बिखेरे ये दाने दुनके चुन ले री चिड़िया सुन ले री चिड़िया सुन ले री चिड़िया आ प्यारी चिड़िया आ प्यारी चिड़िया उड़-उड़ के आना मुड़ मुड़ के जाना बच्चों को अपने दाना खिलाना लगता है जी को कैसा सुहाना क्या प्यारा प्यारा है तेरा गाना गा ख़ूब दिन भर गा प्यारी चिड़िया आ प्यारी चिड़िया आ प्यारी चिड़िया उड़ जा री चिड़िया उड़ जा री चिड़िया वो मानो बिल्ली बैठी है दुबकी तुझ को पकड़ कर बस खा ही लेगी मिट्टी के ऊपर जा बैठ ऊँची नीचे न आना मुड़ जा री चिड़िया उड़ जा री चिड़िया उड़ जा री चिड़िया — Hafeez Jalandhari
उफ़ वो रावी का किनारा वो घटा छाई हुई शाम के दामन में सब्ज़े पर बहार आई हुई वो शफ़क़ के बादलों में नील-गूँ सुर्ख़ी का रंग और रावी की तलाई नुक़रई लहरों में जंग शह-दरे में आम के पेड़ों पे कोयल की पुकार डालियों पर सब्ज़ पत्तों सुर्ख़ फूलों का निखार वो गुलाबी अक्स में डूबी हुई चश्म-ए-हुबाब और नशे में मस्त वो सरमस्त मौजों के रुबाब वो हवा के सर्द झोंके शोख़ियाँ करते हुए बिन पीए बा-मसत कर देने का दम भरते हुए दूर से ज़ालिम पपीहे की सदा आती हुई पय-ब-पय कम-बख़्त पी-पी कह कर उकसाती हुई और वो मैं ठंडी ठंडी रेत पर बैठा हुआ दोनों हाथों से कलेजा थाम कर बैठा हुआ शैख़-साहिब! सच तो ये है उन दिनों पीता था मैं उन दिनों पीता था या'नी जिन दिनों जीता था में अब वो आलम ही कहाँ है मय पिए मुद्दत हुई अब मैं तौबा क्या करूँँ तौबा किए मुद्दत हुई — Hafeez Jalandhari
शराब-ख़ाना है बज़्म-ए-हस्ती हर एक है महव-ए-ऐश-ओ-मस्ती मआल-बीनी ओ मय-परस्ती अरे ये ज़िल्लत अरे ये पस्ती शिआर-ए-रिंदाना कर पिए जा अगर कोई तुझ को टोकता है शराब पीने से रोकता है समझ इसे होश में नहीं है ख़िरद के आग़ोश में नहीं है तू इस से झगड़ा न कर पिए जा ख़याल-ए-रोज़-ए-हिसाब कैसा सवाब कैसा अज़ाब कैसा बहिश्त ओ दोज़ख़ के ये फ़साने ख़ुदा की बातें ख़ुदा ही जाने फ़ुज़ूल सोचा न कर पिए जा नहीं जहाँ में मुदाम रहना तो किस लिए तिश्ना-काम रहना उठा उठा हाँ उठा सुबू को तमाम दुनिया की हाव हूँ को ग़रीक़-ए-पैमाना कर पिए जा किसी से तकरार क्या ज़रूरत फ़ुज़ूल इसरार क्या ज़रूरत कोई पिए तो उसे पिला दे अगर न माने तो मुस्कुरा दे मलाल-ए-असला न कर पिए जा तुझे समझते हैं अहल-ए-दुनिया ख़राब ख़स्ता ज़लील रुस्वा नहीं अयाँ उन पे हाल तेरा कोई नहीं हम-ख़याल तेरा किसी की परवा न कर पिए जा ये तुझ पर आवाज़े कसने वाले तमाम हैं मेरे देखे भाले नहीं मज़ाक़ उन को मय-कशी का ये ख़ून पीते हैं आदमी का तू उन का शिकवा न कर पिए जा — Hafeez Jalandhari
(1) गर्म-जोशी अब सूरज सर पर आ धमकेगा ठंडा लोहा चमकेगा और धूप जवाँ हो जाएगी सठियाए हुए फ़र्ज़ानों पर अब ज़ीस्त गिराँ हो जाएगी हर अस्ल अयाँ हो जाएगी अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब आग बगूले नाचेंगे सब लंगड़े लूले नाचेंगे गिर्दाब-ए-बला बन जाएँगे रौंदी हुई मिट्टी के ज़र्रे तूफ़ान-ब-पा बन जाएँगे सहरा दरिया बन जाएँगे अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब सुस्ती जाल बिछाएगी अब धोंस न चलने पाएगी मज़दूरों और किसानों पर अब सूखा ख़ून निचोड़ने वाले रोएँगे नुक़्सानों पर इन खेतों इन खलियानों पर अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब पीली धात की बीमारी फैला न सकेंगे ब्योपारी लोहे का लोहा मानेंगे सोने की गहरी कानों में सो जाना बेहतर जानेंगे दर दर की ख़ाक न छानेंगे अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब ख़ून के सागर खोलेंगे इंसान के जौहर खोलेंगे चढ़ जाएगी तप सहराओं को उट्ठेगी उमड कर लाल आँधी पी जाएगी दरियाओं को बाँधेगा तुंद हवाओं को अब ख़ूब हँसेगा दीवाना हर ज़ुल्फ़ से बिच्छू लपकेंगे आँखों से शरारे टपकेंगे सय्यादों हुस्न-शिकारों पर ग़ुस्से का पसीना फूटेगा मोती बन कर रुख़्सारों पर इस धूप में चाँद सितारों पर अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब दूध न देंगी भैंसें गाएँ उफ़ उफ़ करने लगेंगी माएँ बच्चे मम मम चीख़ेंगे और ऊँघने वाले निखटू शौहर ''अक़ल-ए-मुजस्सम'' चीख़ेंगे सब दरहम-बरहम चीख़ेंगे अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब ख़ानक़हों की मुर्दा उदासी रोज़-ए-अज़ल की भूकी प्यासी झूमेगी मय-ख़ानों पर अब साक़ी मुग़चे पीर-ए-मुग़ाँ बेचेंगे वाज़ दुकानों पर इन ज़हर भरे पैमानों पर अब ख़ूब हँसेगा दीवाना ज़ोर-आवरी से कमज़ोरों की अब जेब कटेगी चोरों की और मंडी साहू-कारों की अब भूकी ''हू-हक़'' सैर करेगी मंडियों और बाज़ारों की गत देख के दुनिया-दारों की अब ख़ूब हँसेगा दीवाना जीना दिल गुर्दा ढूँडेगा हर ज़िंदा ''मुर्दा'' ढूँडेगा कोई कोना-खदरा तह-ख़ाना अब हर जंगल में मंगल होगा हर बस्ती में वीराना इक नारा लगा कर मस्ताना अब ख़ूब हँसेगा दीवाना (2) सर्द-मेहरी अब जाड़ा झँडे गाड़ेगा और फ़ील-ए-फ़लक चिंघाड़ेगा अब बादल शोर मचाएँगे अब भूत फ़लक पर चढ़ दौड़ेंगे धरती को दहलाएँगे हँसने के मज़े अब आएँगे अब ख़ूब हँसेगा दीवाना ऐवान करेंगे भाएँ भाएँ फूँस की झोंपड़ियों में हवाएँ साएँ साएँ गूँजेंगी इस गूँज में भूके नंगों की सुनसान सदाएँ गूँजेंगी वीरान सराएँ गूँजेंगी अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब बिजली के कोड़ों से हवा शमशीर-ब-कफ़ ज़ंजीर-ब-पा लोहे के रथों को हाँकेगी एक एक धुएँ के महमिल से सद हुस्न की मलिका झाँकेगी अब आग अंगारे फाँकेगी अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब ठंडी आहों के परनाले पाले आफ़त के पर काले कंदे तोले बरसेंगे अब आहन ठंडा पड़ जाएगा आहन के गोले बरसेंगे हर सर पर ओले बरसेंगे अब ख़ूब हँसेगा दीवाना तख़रीब की तोपें छूटेंगी तामीर की कलियाँ फूटेंगी हर गोरिस्तान-ए-शाही में बाला-ए-हवा ज़ेर-ए-दरिया ग़ुल होगा मुर्ग़ ओ माही में इस नौ-आबाद तबाही में अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब नागिन ब़ाँबी गरमाएगी साँप की लाली लहराएगी काले आतिश-दानों में दानाइयाँ केंचुली बदलेंगी शहरों के बंदी-ख़ानों में और दूर खुले मैदानों में अब ख़ूब हँसेगा दीवाना भुस ख़ाली पेट में भर न सकेगा कोई तिजारत कर न सकेगा सुकड़ी सुकड़ी खालों की अब मंढ भी जाए तो बज न सकेगी नौबत पैसे वालों की बेकारी पर दल्लालों की अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब दाल न जागीरों की गलेगी आग मगर दिन रात जलेगी चमड़े के तन्नूरों में अब काल पड़ेगा ग़ल्ले का ब्योपारियों बे-मक़दूरों में और पेट भरे मज़दूरों में अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब गाढ़ा पसीना बुनने वाले ओढ़े फिरेंगे शाल दो-शाले मुफ़्त न झूलें झूलेंगी फूले हुए गाल अब पचकेंगे पिचकी हुई तोंदें फूलेंगी सब अक़्लें चौकड़ी भूलेंगी अब ख़ूब हँसेगा दीवाना — Hafeez Jalandhari
फ़ित्ना-ए-ख़ुफ़ता जगाए उस घड़ी किस की मजाल क़ैद हैं शहज़ादियाँ कोई नहीं पुर्सान-ए-हाल इन ग़रीबों की मदद पर कोई आमादा नहीं एक शाएर है यहाँ लेकिन वो शहज़ादा नहीं आहूओं की सुर्मगीं पलकें फ़ज़ा पर हुक्मराँ छाई हैं अर्ज़ ओ समा पर आहनीं सी जालियाँ दूर से कोहसार ओ वादी पर ये होता है गुमाँ ऊँट हैं बैठे हुए उतरा हुआ है कारवाँ या असर हैं आसमान-ए-पीर पर बरसात के ख़ेमा-ए-बोसीदा में पैवंद हैं बानात के और इस ख़ेमे के अंदर ज़िंदगी सोई हुई तीरगी सोई हुई ताबिंदगी सोई हुई ऐ 'हफ़ीज़' इन नींद के मातों की मंज़िल से निकल काम है दरपेश दाम-ए-दीदा-ओ-दिल से निकल दीदा-ओ-दिल को भी ग़फ़लत के शबिस्ताँ से निकाल ये जो ख़ामोशी की ज़ंजीरें हैं इन को तोड़ डाल सुब्ह करने के लिए फिर हाव-हू दरकार है शुक्र कर सोती हुई दुनिया में तू बेदार है — Hafeez Jalandhari
दरिया चढ़ाव पर है और बोझ नाव पर है पहना-ए-आब सारा है कूच का इशारा होश-आज़मा नज़ारा मौजों के मुँह में कफ़ है इक शोर हर तरफ़ है मर्ग-आफ़रीं है धारा और दूर है किनारा कोई नहीं सहारा तेग़-आज़मा हैं लहरें तेग़ें हैं या हैं लहरें तौबा हवा की तेज़ी मौज-ए-फ़ना की तेज़ी है किस बला की तेज़ी तदबीर-ए-नाख़ुदा क्या चप्पू का आसरा क्या गिर्दाब पड़ रहे हैं कश्ती से लड़ रहे हैं तख़्ते उखड़ रहे हैं नग़्मों का जोश ख़ामोश सब नाव-नोश ख़ामोश है ये बरात किस की नौ-शाह और बराती लौटे हैं ले के डोली मायूस हैं निगाहें रक़्साँ लबों पे आहें डोली में हूर पैकर क्या काँपती है थरथर लेकिन है मुहर लब पर दूल्हा के सर पे सहरा लेकिन उदास चेहरा इशरत की आरज़ू थी उल्फ़त की जुस्तुजू थी उम्मीद रू-ब-रू थी ये इंक़लाब क्या है आग़ोश-मर्ग वा है अफ़्सोस या-इलाही क्या आ गई तबाही क़िस्मत की कम निगाही दिल सर्द हो रहे हैं रुख़ ज़र्द हो रहे हैं इस महशर-ए-बला में इस लहजा-ए-फ़ना में इस सैल-ए-बाद-पा में सब अहल-ए-यास गुम हैं होश-ओ-हवा से गुम हैं कुछ महव हैं दुआ में कुछ नाला-ओ-बुका में कुछ शिकवा-ए-ख़ुदा में बैठी है एक बेवा है सब्र जिस का शेवा दिल हाथ से दबाए बच्चा गले लगाए तीर-ए-उमीद खाए ये बाप की निशानी सर्माया-ए-जवानी इक दिन जवान होगा अमाँ का मान होगा हक़ मेहरबान होगा इक नौजवाँ बद-अख़तर भागा है घर से लड़ कर छोड़े थे बाप-माँ भी बीवी भी और मकाँ भी अब छोड़ता है जाँ भी ऐ काश मैं न आता ऐ काश लौट जाता ऐ तब-ए-ख़ुद-सर अफ़्सोस ऐ तैश तुझ पर अफ़्सोस अफ़्सोस यकसर अफ़्सोस ये देव-ज़ाद मौजें ये नौ-निहाद मौजें आया फिर एक रेला कश्ती बनी है तिनका बस हो चला सफ़ाया तदबीर रो रही है तक़दीर सो रही है मल्लाह तैर निकले दरिया में पैर निकले अफ़्सोस ग़ैर निकले तूफ़ान-ए-ग़म बहा है फ़रियाद की सदा है है कौन जो सँभाले कश्ती तिरे हवाले यारब तू ही बचा ले ऐ नाव के खवय्या लग जाए पार नय्या बंदों का तू ख़ुदा है और तू ही नाख़ुदा है तेरा ही आसरा है — Hafeez Jalandhari
लहद में सो रही है आज बे-शक मुश्त-ए-ख़ाक उस की मगर गर्म-ए-अमल है जागती है जान-ए-पाक उस की वो इक फ़ानी बशर था मैं ये बावर कर नहीं सकता बशर इक़बाल हो जाए तो हरगिज़ मर नहीं सकता ब-ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार-ए-मस्जिद है जो आसूदा ये ख़ाकी जिस्म है सत्तर बरस का राह पैमूदा ये ख़ाकी जिस्म भी उस का बहुत ही बेश-क़ीमत था जिसे हम-जल्वा समझे थे वो पर्दा भी ग़नीमत था उसे हम नापते थे ले के आँखों ही का पैमाना ग़ज़ल-ख़्वाँ उस को जाना हम ने शाइ'र उस को गर्दाना फ़क़त सूरत ही देखी उस के मअ'नी हम नहीं समझे न देखा रंग-ए-तस्वीर आइने को दिल-नशीं समझे हमें ज़ोफ़-ए-बसारत से कहाँ थी ताब-ए-नज़्ज़ारा सिखाए उस के पर्दे ने हमें आदाब-ए-नज़ारा ये नग़्मा क्या है ज़ेर-ए-पर्दा-हा-ए-साज़ कम समझे रहे सब गोश-बर-आवाज़ लेकिन राज़ कम समझे शिकस्त-ए-पैकर-ए-महसूस ने तोड़ा हिजाब आख़िर तुलू-ए-सुब्ह-ए-महशर बन के चमका आफ़्ताब आख़िर मुक़य्यद अब नहीं 'इक़बाल' अपने जिस्म-ए-फ़ानी में नहीं वो बंद हाइल आज दरिया की रवानी में वजूद-ए-मर्ग की क़ाएल नहीं थी ज़िंदगी उस की त आला अल्लाह अब देखे कोई पाइंदगी उस की जिसे हम मुर्दा समझे ज़िंदा तर पाइंदा तर निकला मह ओ ख़ुर्शीद से ज़र्रे का दिल ताबिंदा तर निकला अभी अंदाज़ा हो सकता नहीं उस की बुलंदी का अभी दुनिया की आँखों पर है पर्दा फ़िरक़ा-बंदी का मगर मेरी निगाहों में हैं चेहरे उन जवानों के जिन्हें 'इक़बाल' ने बख़्शे हैं बाज़ू क़हर-मानों के — Hafeez Jalandhari
चाँद जब ईद का नज़र आया हाल क्या पूछते हो ख़ुशियों का आसमाँ पर हवाइयाँ छूटीं नौबतें मस्जिदों में बजने लगीं शुक्र सब ख़ास-ओ-आम करने लगे और बाहम सलाम करने लगे नन्हे बच्चे हैं ख़ास कर मसरूर कहते हैं ईद अब है कितनी दूर माएँ कहती हैं कुछ नहीं अब दूर सुब्ह आ जाएगी यहाँ पे ज़रूर आओ खा पी के सो रहो चुप चाप आएगी ईद सुब्ह आपी-आप बच्चों की आँख में है नींद कहाँ हैं उन्हें तो चढ़ी हुई ख़ुशियाँ हो गई रात काटनी मुश्किल कल के दिन पर लगा हुआ है दिल बच्चियों ने लगाई है मेहंदी रंगयाली मँगाई है मेहंदी अच्छे अच्छे बनाए हैं कपड़े सब नए सिल के आए हैं कपड़े बच्चे बे-ए'तिबार ऐसे हैं उन को रख कर सिरहाने सोए हैं आ गई नींद सो गए बच्चे बारे ख़ामोश हो गए बच्चे ख़्वाब भी ईद ही के आते हैं सोते से उठ के बैठ जाते हैं सुब्ह-ए-सादिक़ का हो गया है ज़ुहूर सारी दुनिया पे छा गया इक नूर चिड़ियाँ पेड़ों पे चहचहाने लगीं ईद के गीत मिल के गाने लगीं शर्क़ पर जल्वा-गर हुआ सूरज आज है कुछ नया नया सूरज ताज ख़ूब उस ने आज पहना है सुर्ख़ किरनों का ताज पहना है हर मुसलमान बाग़-बाग़ है आज आसमाँ पर हर इक दिमाग़ है आज सुब्ह उठते ही सब ने ग़ुस्ल किया पहना उजला लिबास इत्र मला माएँ नहला रही हैं बच्चों को ख़ूब बहला रही हैं बच्चों को बच्चे ख़ुश हों यही है सारी ईद उन के बच्चों की ईद उन की ईद बच्चियों ने भी सर गुंधाया है माँओं ने ख़ूब उन्हें सजाया है जोड़े रंगीन सब ने पहने हैं चाँदी सोने के सारे गहने हैं ओढ़नी पर टिका हुआ गोटा देखना है दमक रहा कैसा भाइयों को बुलाती फिरती हैं अपने कपड़े दिखाती फिरती हैं हाथ मेहंदी रंगे दिखाती हैं ख़ुश हैं हँसती हैं खिलखिलाती हैं और लड़के भी हो गए तय्यार सर पे बाँधी है लट-पटी दस्तार ख़ुशनुमा सब ने सूट पहने हैं और पैरों में बूट पहने हैं किया झुक कर सलाम माँओं को बाप दादों को और चचाओं को सब से पैसे झगड़ झगड़ के लिए रूठ कर ज़िद से और अड़ के लिए हाथ में लकड़ी जेब में रूमाल चलते फिरते हैं क्या ठुमकती चाल हो चुकी अब तो ख़ूब तय्यारी और सेवइयों की आ गई बारी फ़र्श पर बिछ गया है दस्तर-ख़्वान मिल के बैठे हैं बच्चे बूढे जवान सामने है भरी हुई थाली हैं सिवय्याँ भी ख़ूब रूमाली ख़ूब खाते हैं और खिलाते हैं यूँँ ख़ुशी ईद की मनाते हैं लोग सब ईद पढ़ के निकले हैं गोया परवान चढ़ के निकले हैं ख़ुश हैं सब और करते हैं ख़ैरात लूटते हैं सवाब हाथों हात जान पहचान मिलते हैं अक्सर ईद मिलते हैं सब गले मिल कर बच्चे-बाले भी साथ हैं सारे जो कि हैं ईद देखने आए उन को मेला दिखाते फिरते हैं चीज़याँ भी खिलाते फिरते हैं बच्चे लट्टू हुए खिलौनों पर वो भी झोली में रख लिए ले कर क्यूँ न हो खेल का यही सिन है और फिर आज ईद का दिन है — Hafeez Jalandhari
सियाही बन के छाया शहर पर शैतान का फ़ित्ना गुनाहों से लिपट कर सो गया इंसान का फ़ित्ना पनाहें हुस्न ने पाईं सियहकारी के दामन में वफ़ादारी हुई रू-पोश नादारी के दामन में मुयस्सर हैं ज़री के शामियाने ख़ुश-नसीबी को ओढ़ा दी साया-ए-दीवार ने चादर ग़रीबी को मशक़्क़त को सिखा कर ख़ूबियाँ ख़िदमत-गुज़ारी की हुईं बे-ख़ौफ़ बे-ईमानियाँ सरमाया-दारी की लिया आग़ोश में फूलों की सीजों ने अमीरी को मुहय्या ख़ाक ही ने कर दिए आसन फ़क़ीरी को तड़पना छोड़ कर चुप हो गए जी हारने वाले मज़े की नींद सोए ताज़ियाने मारने वाले वो रूहानी वो जिस्मानी उक़ूबत कम हुई आख़िर ग़ुलामी बेड़ियों के बोझ से बे-दम हुई आख़िर हुए फ़रियादियों पर बंद ऐवानों के दरवाज़े कि ख़ुद मुहताज-ए-दरबाँ हैं जहाँ-बानों के दरवाज़े इसी अंदाज़ से जा सोई ग़फ़लत बादशाहों की सुरूर ओ कैफ़ बन कर छा गईं नींदें गुनाहों की शराबें ख़त्म कर के हो गए ख़ामोश हंगा में बिल-आख़िर नींद आई सो गए पुर-जोश हंगा में थमा जब ज़िंदगी का जोश परख़ाश-ए-अजल जागी अमल को देख कर मदहोश पादाश-ए-अमल जागी उठाया मौत ने पत्थर जहन्नम के दहाने से जहाँ आतिश का दरिया खोलता था इक ज़माने से बुलंदी से तबाही के समुंदर ने किया धावा चटानों के जिगर से फूट निकला आतशीं-लावा दिखा दी आग ऐवानों को मज़लूमी की आहों ने उठाए शोला-हा-ए-आतशीं बेकस निगाहों ने उन्हें मुख़्तार बन कर बेकसी के ख़ून की मौजें हिसार-ए-मर्ग ने महसूर कर लीं जंग जो फ़ौजें न हुस्न ओ इश्क़ ने पाई अमाँ क़हर-ए-इलाही से दबी पादाश अमीरी से फ़क़ीरी से न शाही से सितारों की निगाहों ने धुआँ उठता हुआ देखा मगर ख़ुर्शीद ने कुछ भी न मिट्टी के सिवा देखा — Hafeez Jalandhari
आगे पीछे दाएँ बाएँ काएँ काएँ काएँ काएँ सुब्ह-सवेरे नूर के तड़के मुँह धो-धा कर नन्हे लड़के बैठते हैं जब खाना खाने कव्वे लगते हैं मंडलाने तौबा तौबा ढीट हैं कितने कव्वे हैं या काले फ़ित्ने लाख हँकाओ लाख उड़ाओ मुँह से चीख़ो हाथ हिलाओ घूरो घुड़को या धुतकारो कोई चीज़ उठा कर मारो कव्वे बाज़ नहीं आते हैं जाते हैं फिर आ जाते हैं हर दम है खाने की आदत शोर मचाने की है आदत बच्चों से बिल्कुल नहीं डरता उन की कुछ परवा नहीं करता देखा नन्हा भोला-भाला छीन लिया हाथों से निवाला कोई इशारा हो या आहट ताड़ के उड़ जाता है झट-पट अब करने दो काएँ काएँ हम क्यूँँ अपनी जान खपाएँ — Hafeez Jalandhari
मिरी शाएरी है नज़ारों की दुनिया ये नग़्मा-सरा जोइबारों की दुनिया ये हंगामा-ज़ार आबशारों की दुनिया फ़लक-आश्ना कोहसारों की दुनिया ये फूलों की बस्ती बहारों की दुनिया यही है मिरे शाह-कारों की दुनिया मिरी शाएरी है नज़ारों की दुनिया मिरी शाएरी चाँद तारों की दुनिया ये रंगीं घरौंदा तिलिस्म-ए-ज़माना खिलौनों का है इक बड़ा कारख़ाना हवा बाँधना और ग़ुबारे बनाना ग़ुबारे बना कर फ़ज़ा में उड़ाना मिरे शे'र का शोबदा है पुराना मिरी शाएरी चाँद तारों की दुनिया मिरी शाएरी बख़्त-यारों की दुनिया फ़लक शामियाना है पर्बत कनातें इसी ओट में दीदा-ओ-दिल की घातें हुजूम-ए-तमन्ना ख़ुशी की बरातें जवानी के दिन कामरानी की रातें मिरे शे'र की ये भी हैं वारदातें मिरी शाएरी बख़्त-यारों की दुनिया मिरी शाएरी ख़ार-ज़ारों की दुनिया तही-दस्ती ओ पस्ती ओ ख़स्ता-हाली बगूलों से मामूर फूलों से ख़ाली वो बेशा कि है मज़रा-ए-ख़ुश्क-साली जहाँ अब्र भूला है दरिया-नवाली न भूली उसे भी मिरी फ़िक्र-ए-आली मिरी शाएरी ख़ारज़ारों की दुनिया मिरी शाएरी शह-सवारों की दुनिया बहादुर जरी सूरमा और जियाले क़ज़ा जिन की ढालें क़दर जिन के भाले तहव्वुर के घोड़ों की बागें सँभाले चले हैं सू-ए-रज़्म-गह अज़्म वाले मिरे शे'र हैं ग़ाज़ियों के रिसाले मिरी शाएरी शह-सवारों की दुनिया मिरी शाएरी दिल-फ़िगारों की दुनिया ये फ़रियाद-ए-ख़ामोश नीची निगाहें ये अरमाँ कि मसदूद हैं जिन की राहें फ़रेब-ए-वफ़ा से कहाँ तक निबाहें मिरे दीदा-ओ-दिल हैं इन की पनाहें मिरे शे'र आँसू मिरे शे'र आहें मिरी शाएरी दिल-फ़िगारों की दुनिया मिरी शाएरी बे-क़रारों की दुनिया वो ज़र्रा कि राह-ए-सुकूँ में मुख़िल है वो क़तरा कि सद-आतिश-ए-मुश्तइल है वो दीदा कि बेदारी-ए-मुस्तक़िल है वो दिल जिस से दिल गर्मी-ए-आब-ओ-गिल है मिरे शे'र में भी वही एक दिल है मिरी शाएरी बे-क़रारों की दुनिया मिरी शाएरी ख़ाकसारों की दुनिया बसेरा ख़स-ओ-ख़ार-ओ-ख़ाशाक पर है मगर हाथ हर ख़ोशा-ए-ताक पर है अगरचे सर-ए-बे-ख़ुदी ख़ाक पर है दिमाग़-ए-ख़ुदी औज-ए-अफ़्लाक पर है मिरे शे'र की आँख इदराक पर है मिरी शाएरी ख़ाकसारों की दुनिया मिरी शाएरी बादा-ख़्वारों की दुनिया चले जाम-ए-जम भी जमें बज़्म-ए-मय भी मगर साक़िया देख इक और शय भी ये फ़रियाद मेरी कि है जिस में लय भी ये नाला मिरा जो है पाबंद-ए-नय भी मिरा शे'र शीशा भी नश्शा भी मय भी मिरी शाएरी बादा-ख़्वारों की दुनिया मिरी शाएरी दोस्त-दारों की दुनिया ये दुनिया जहाँ से अलग इक जहाँ है ये दिल-नवाज़ी का सिक्का रवाँ है यहाँ आसमाँ है मगर मेहरबाँ है न जाने अदावत की दुनिया कहाँ है मिरा शे'र इख़्लास का तर्जुमाँ है मरी शाएरी दोस्त-दारों की दुनिया मिरी शाएरी ग़मगुसारों की दुनिया फ़लक महर-पर्वर ज़मीं मह-जबीं है न वो सर्द-मेहर और न ये गर्म-कीं है फ़लक भी हसीं है ज़मीं भी हसीं है वो नूर-आफ़रीं ये ज़ुहूर-आफ़रीं है मिरे आइने में कुदूरत नहीं है मिरी शाएरी ग़मगुसारों की दुनिया मिरी शाएरी मेरे प्यारों की दुनिया वो प्यारे कि सू-ए-अदम जा चुके हैं वो कलियाँ वो ग़ुंचे जो मुरझा चुके हैं तराने जो आराम फ़रमा चुके हैं ख़ज़ाने जिन्हें लोग दफ़ना चुके हैं मिरे शे'र में ज़िंदगी पा चुके हैं मिरी शाएरी मेरे प्यारों की दुनिया मिरी शाएरी इंतिज़ारों की दुनिया कभी मैं भी हो जाऊँ आज़ाद शायद असीरी की घट जाए मीआ'द शायद सुनी जाए इक रोज़ फ़रियाद शायद वो भूले से कर ले मुझे याद शायद वहाँ काम आए ये रूदाद शायद मिरी शाएरी इंतिज़ारों की दुनिया मिरी शाएरी है इशारों की दुनिया फ़लक पर हैं गर्दिश में चाँद और तारे ज़मीं पर बहार-ओ-ख़िज़ाँ के नज़ारे बराबर चले जा रहे हैं बिचारे कि ज़ौक़-ए-नज़र दे रहा है सहारे मगर कौन समझे ये नाज़ुक इशारे मिरी शाएरी है इशारों की दुनिया — Hafeez Jalandhari