जिस्म भी आँख के पानी से हरा रहता था
सर भी क्या सर था कि ज़ानू पे पड़ा रहता था
आह-ओ-फ़रियाद के मौसम भी गुज़रते थे मगर
ऐसी बस्ती ही नहीं थी कि ख़ुदा रहता था
उसके बरताव से समझा कि मुक़द्दर में है प्यास
नहर था और सराबों से घिरा रहता था
शीशा-ए-शाम-ए-शिकस्ता में शफ़क़ फूटती थी
रात भर ‘अक्स मेरा ख़ूँ में सना रहता था
आँख पर आँख पड़ी रहती थी और फूल पे फूल
उसके हमराह ‘'अजब बाग़ सजा रहता था
आप ही आप उलझ जाती थीं बातें अपनी
या कोई चोर कहीं दिल में छुपा रहता था
मैंने दरयाफ़्त किया एक ही शख़्स ऐसा 'कुमार'
मैं न गुज़रूँ भी तो रस्ते में बिछा रहता था
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