नज़र इक साया-ए-अब्र-ए-बला पर जम गई है

ये कालिख दिल से उतरी है घटा पर जम गई है

मैं हर बुत को हरारत की कशिश बतला रहा हूँ
अजब इक बर्फ़ मेरे देवता पर जम गई है

ज़रूर अगली रुतें अब रास्ता भटकेंगी इस से
ये जो कुछ रेत मेरे नक़्श-ए-पा पर जम गई है

बदन पर नक़्श रह जाते हैं और दिल में नदामत
किसी लम्हे की उजलत दस्त-ओ-पा पर जम गई है

हमारे सर तो आख़िर ख़ाक ही होने थे इक दिन
ये कैसी रौशनी तेग़-ए-जफ़ा पर जम गई है

छुपाना चाहता था मैं उसे शे'रों में अपने
अब इक आलम की आँख उस बे-वफ़ा पर जम गई है

हमारे पाँव में चक्कर है वो भी चाँद का है
सितारों की थकन उस की रिदा पर जम गई है

— Vipul Kumar

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