Sahil Verma

Sahil Verma

@sh0rr

Sahil Verma shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sahil Verma's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

0

Content

79

Likes

105

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

Sher

धुलते हैं पाप उसी के जो भी पाप का अपने मज़ा चखता है — Sahil Verma
दूरियों में किसी को राहत है पास में होने से दम घुटता है — Sahil Verma
होता अच्छे के लिए ही सबके ईश्वर जब भी जो भी करता है — Sahil Verma
दिखते हैं बुरे जो भी होते हैं कभी अच्छे होते हैं जो वहशी वो ख़ूँखार नहीं दिखते — Sahil Verma
कितनी ही ज़िम्मेदारियाँ बस एक मन में होती हैं माँ की बहुत सी ख़ूबियाँ हर इक बहन में होती हैं — Sahil Verma
कुछ बातें ख़ुद से भी छिपाई जाती हैं सारी नहीं सब को बताई जाती हैं — Sahil Verma
जिस का होता नहीं है लचीला बदन उस की बातों में काफ़ी लचक होती है — Sahil Verma
शब्दों में उतनी अश्लीलता ही नहीं जितनी मन में किसी के ठरक होती है — Sahil Verma
कोई यूँँ ही नहीं रोता है रातों में सबके दिल में कोई तो कसक होती है — Sahil Verma
याद बनकर लिखा होता दिल पे जो भी एक आँसू वो सब कुछ मिटा आता है — Sahil Verma
एक तो रोटी छुड़ा कर खाता दूजा रोटी लुटा कर पलता है — Sahil Verma
होता कुछ और है साहिल आख़िर सब को कुछ और ही मगर लगता है — Sahil Verma
वो अपने ही अंदर में ख़ुद से है लड़ता जो कहता है मुझ को नहीं फ़र्क पड़ता — Sahil Verma
हर बड़ा काम यूँँ ही नहीं होता है करने वाले में भी तो सनक होती है — Sahil Verma
जब भी दिल टूटता है कहीं जो कोई जाने क्यूँँ नाम 'साहिल' तेरा आता है — Sahil Verma
बातें जब दिल को काफ़ी जला देती हैं अस्थियाँ दिल की ये मन बहा आता है — Sahil Verma
काश उस का कॉल आ जाए अधूरी रात को और फिर हम दोनों में पूरी की पूरी बात हो — Sahil Verma
जिन की क़िस्मत चमकती नहीं है कभी उन की आँखों में ज़्यादा चमक होती है — Sahil Verma
इस पार के दिखते हैं सब लोग तुझे अपने कुछ यार तुझे लेकिन उस-पार नहीं दिखते — Sahil Verma

Ghazal

कहीं जो कोई हम डगर देखते हैं वहीं इक सुहाना सफ़र देखते हैं किसी को नहीं है किसी की ख़बर पर सभी सब को ही बा-ख़बर देखते हैं सखी को हमारी नज़र लग न जाए उसे ख़्वाब में रात भर देखते हैं कभी जिस जगह रहते थे कृष्ण राधा चलो प्रेम का वो नगर देखते हैं कि आगे या पीछे कि ऊपर या नीचे तू ही दिखती है हम जिधर देखते हैं बदलते हुए दोस्त के भाव में हम किसी लड़की का ही असर देखते हैं कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा हम ने हमारे नयन बस शिखर देखते हैं मैं तो लड़की की सादगी देखता हूँ मिरे दोस्त उन का फिगर देखते हैं नहीं रक्खा लोगों के रंगों में कुछ भी चलो रेनबो के कलर देखते हैं बहू बेटी से हैं जो नज़रें चुराते वो और लड़की को घूर कर देखते हैं ख़ुदा का भी डर है नहीं उन को जैसे वो सब क़त्ल भी इस क़दर देखते हैं हमें रोज़ घर देखने की है आदत चलो आज साहिल का घर देखते हैं — Sahil Verma

Nazm

" तुम मुझे गले नहीं लगातीं " मेरी बाहें राह देख थक जातीं तुम्हारे सितम पर मुझ को हैरानियाँ तक नहीं आतीं और मैं तुम्हारे ख़्वाबों को नैनों से बहती धारों को इन होंठों की मुस्कानों को झुमके वाले कानों को तुम्हारे उन सभी राज़ों को अपने अनकहे वादों को कुछ मज़बूत इरादों को तुम्हारी चश्मदीद निगाहों को तुम्हारी कड़वी-मीठी बातों को तुम्हारे बँधे हुए बालों को साँवले ख़ूब-सूरत हाथों को खिलखिलाते तुम्हारे दाँतों को तुम्हारे संग बिताई यादों को कब से बाहों में भर चुका हूँ दिल-लगी से तुम्हारी तर चुका हूँ तुम इक यही रस्म क्यूँँ नहीं निभातीं आख़िर तुम मुझे गले क्यूँँ नहीं लगातीं — Sahil Verma