शहर-ए-नाज़ुक से वो बारीक सड़क जाती है
मैं बस इक पाँव टिकाता हूँ तड़क जाती है
और पैवस्त हुआ जाता है पत्थर में चराग़
लग के उस हाथ से लौ और भड़क जाती है
मैं बुरा चोर नहीं हूँ मगर उस कूचे में
दिल धड़क जाता है पा-पोश खड़क जाती है
फूल ख़ुशबू से बिगड़ते हैं हमें भी ले चल
और झोंके से वो दामन को झड़क जाती है
ख़्वाब का रिज़्क़ हुई जाती है बेदारी की उम्र
नींद क्या चीज़ है आँखों में रड़क जाती है
— Vipul Kumar















