भरम दुनिया का पहले से ज़ियादा खुल रहा है
ये आँखें खुल रही हैं या तमाशा खुल रहा है
सफ़र आगे है बे-सामानी-ए-दिल का उठे है
अभी से देखिए सामान सारा खुल रहा है
ये दिल मशहूर था लब-बस्तगी और ख़स्तगी में
ख़ुदा रक्खे तेरी महफ़िल में कितना खुल रहा है
ठहर ऐ शोरिश-ए-दीदार बत्ती जल रही है
थम ऐ पाओं की बे-ताबी दरीचा खुल रहा है
कहीं ऐसा न हो बह जाए सब मिट्टी बदन की
किनारा कर मेरी आँखों का दरिया खुल रहा है
— Vipul Kumar















